पहली बार निजी कंपनियां बनाएंगी और चलाएंगी न्यूक्लियर प्लांट, SHANTI Bill 2025 से बदलेगा भारत का पावर गेम
SHANTI Bill 2025: भारत की ऊर्जा नीति में अब तक का सबसे बड़ा बदलाव सामने आया है। संसद से SHANTI Bill पास होते ही देश का न्यूक्लियर सेक्टर एक नए दौर में प्रवेश कर गया है। अब तक पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहने वाला परमाणु बिजली उत्पादन क्षेत्र अब निजी कंपनियों के लिए भी खुल गया है।
खास बात है कि इस कानून के जरिए सरकार ने निवेश, सुरक्षा और जिम्मेदारी तीनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। हालांकि विदेशी कंपनियों को लेकर कुछ सख्त शर्तें भी रखी गई हैं।
क्या है SHANTI Bill 2025?
संसद से पास हुआ SHANTI Bill 2025 (Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) भारत की न्यूक्लियर नीति में बड़ा मोड़ लेकर आया है। दशकों तक पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में रहने वाला परमाणु बिजली उत्पादन क्षेत्र अब निजी कंपनियों के लिए भी खुल गया है।
जिससे L&T, Tata Power, Reliance, Adani, JSW और Vedanta जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां न्यूक्लियर पावर प्लांट बनाने, चलाने और डीकमिशन करने के मौके तलाश सकेंगी। खास बात है कि यह सब एक सख्त सरकारी लाइसेंस सिस्टम के तहत होगा, ताकि सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
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हालांकि रणनीतिक और संवेदनशील हिस्सों जैसे यूरेनियम माइनिंग, फ्यूल कंट्रोल और न्यूक्लियर सुरक्षा पर सरकार का पूरा नियंत्रण पहले की तरह बना रहेगा। वहीं विदेशी कंपनियों को लेकर नियम साफ हैं। वे सीधे प्लांट नहीं चला सकतीं, बल्कि Westinghouse या EDF जैसी कंपनियों को भारत में रजिस्टर्ड इकाइयों के जरिए ही निवेश और तकनीक लानी होगी।
कुल मिलाकर, SHANTI Bill 2025 निजी निवेश और सरकारी नियंत्रण के बीच संतुलन बनाकर भारत के न्यूक्लियर सेक्टर को नई दिशा देने वाला कानून माना जा रहा है।
भारत को अभी Nuclear Enrgy की जरूरत क्यों पड़ी?
बता दें कि भारत में बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है और इसके पीछे इंडस्ट्रियल ग्रोथ, डेटा सेंटर्स, AI और सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग जैसे सेक्टर बड़ी वजह बन रहे हैं। हालाकी सोलर और विंड एनर्जी का दायरा लगातार बढ़ रहा है, लेकिन ये हर समय, यानी 24×7 भरोसेमंद बिजली देने में सक्षम नहीं हैं।
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ऐसे में Nuclear Enrgy एक ऐसा क्लीन और स्थिर विकल्प बनकर सामने आई है, जो बिना रुके बिजली सप्लाई कर सकती है। गौरतलब है कि भारत ने 2070 तक Net Zero का लक्ष्य तय किया है और 2047 तक करीब 100 GW न्यूक्लियर क्षमता हासिल करने की योजना बनाई है।
इसी दिशा में SHANTI Bill भारत के लॉन्ग-टर्म न्यूक्लियर विजन को मजबूती देता है, जिसमें तीन-चरणीय न्यूक्लियर प्रोग्राम शामिल है पहले प्रेसराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर, फिर फास्ट ब्रीडर रिएक्टर और अंत में थोरियम आधारित रिएक्टर, ताकि देश के विशाल थोरियम भंडार का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके।
न्यूक्लियर हादसों में जिम्मेदारी किसकी होगी?
बता दें कि SHANTI Bill में न्यूक्लियर हादसों को लेकर जिम्मेदारी का ढांचा पूरी तरह साफ कर दिया गया है। अगर किसी परमाणु प्लांट में हादसा होता है तो उसकी अधिकतम जिम्मेदारी ऑपरेटर की होगी, जो प्रति घटना ₹3,000 करोड़ तक सीमित रहेगी। इसके बाद की जिम्मेदारी सीधे केंद्र सरकार संभालेगी।
सरकार जरूरत पड़ने पर Nuclear Liability Fund भी बना सकती है, जिससे पीड़ितों को राहत देने में कोई देरी न हो। हालाकी, सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सप्लायर कंपनियों पर अनलिमिटेड जिम्मेदारी नहीं डाली जाएगी, जिससे विदेशी टेक्नोलॉजी कंपनियों की लंबे समय से चली आ रही चिंता काफी हद तक खत्म होती है।
वहीं दूसरी ओर, सुरक्षा के लिहाज से सरकार ने यूरेनियम और थोरियम माइनिंग, न्यूक्लियर फ्यूल एनरिचमेंट, स्पेंट फ्यूल रीप्रोसेसिंग, हाई-लेवल रेडियोएक्टिव वेस्ट मैनेजमेंट और हेवी वॉटर उत्पादन जैसे अहम क्षेत्रों को पूरी तरह अपने नियंत्रण में रखा है। गौरतलब है कि सभी फिसाइल मटीरियल पर सरकार की कड़ी निगरानी बनी रहेगी, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
कौन-कौन से सेक्टर होंगे फायदे में?
सरकार के इस बड़े फैसले से कई सेक्टर सीधे फायदे में आ सकते हैं, जिनमें पावर जेनरेशन, हेवी इंजीनियरिंग, EPC कंपनियां, न्यूक्लियर इंश्योरेंस, प्रोजेक्ट फाइनेंस और लॉन्ग-टर्म ऑपरेशन व मेंटेनेंस शामिल हैं। Tata Power भी इस रेस में आगे दिख रही है और कंपनी के CEO प्रवीर सिन्हा के मुताबिक, 20 से 50 मेगावाट के Small Modular Reactors यानी SMRs पर काम करने की तैयारी चल रही है।
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हालांकि यह भी साफ है कि कानून पास होने के बावजूद प्रोजेक्ट तुरंत जमीन पर नहीं उतरेंगे। एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सरकार को अभी नोटिफिकेशन, टैरिफ स्ट्रक्चर और फ्यूल सप्लाई जैसे अहम मुद्दों पर तस्वीर साफ करनी होगी।
ICRA के अनुसार, न्यूक्लियर प्रोजेक्ट्स की लागत ₹16-20 करोड़ प्रति मेगावाट तक होती है और इन्हें पूरा होने में लंबा वक्त लगता है, जो निजी कंपनियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।