बिहार की कमान मिलते ही सम्राट चौधरी के सामने बड़ी चुनौती, क्या संभाल पाएंगे वित्त से लेकर कानून व्यवस्था?
Samrat Choudhary Bihar CM Challenges: सम्राट चौधरी के बिहार के नए मुख्यमंत्री बनते ही राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। एक तरफ उन्होंने भ्रष्टाचार पर सख्ती और विकास कार्यों में तेजी का संदेश दिया है, वहीं दूसरी तरफ उनके सामने आर्थिक संकट, बढ़ते अपराध और निवेश की कमी जैसी बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सम्राट चौधरी नीतीश कुमार के ‘गुड गवर्नेंस मॉडल’ को उसी मजबूती से आगे बढ़ा पाएंगे या बिहार की राजनीति नई दिशा लेने वाली है?
बिहार की आर्थिक स्थिति नई सरकार के लिए सबसे बड़ी परीक्षा
बता दें कि मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद सम्राट चौधरी ने अधिकारियों को परियोजनाओं को समय पर पूरा करने और सात निश्चय योजना के तीसरे चरण को तेजी से लागू करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बिहार की वित्तीय स्थिति इस समय दबाव में है।
राज्य सरकार पर वेतन, पेंशन और भर्ती के बाद बढ़े खर्च का बड़ा बोझ है। इसके साथ ही 2016 से लागू शराबबंदी के कारण सरकार को राजस्व नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। यही वजह है कि नई सरकार के सामने वित्तीय संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
इसके अलावा विधानसभा चुनाव से पहले कई भत्तों में बढ़ोतरी और मुख्यमंत्री रोजगार योजना जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं ने भी सरकारी खर्च बढ़ा दिया है। इस योजना के तहत लगभग 1.67 करोड़ महिला लाभार्थियों को पहली किस्त के रूप में 10,000 रुपये दिए जा चुके हैं। आगे पात्र महिलाओं को व्यवसाय विस्तार के लिए 2 लाख रुपये तक की दूसरी किस्त देने की योजना है, जिससे सरकारी खजाने पर और दबाव बढ़ सकता है।
| योजना/खर्च का क्षेत्र | प्रभाव |
|---|---|
| वेतन और पेंशन | सरकारी खर्च में भारी वृद्धि |
| शराबबंदी | राजस्व में कमी |
| महिला रोजगार योजना | अतिरिक्त वित्तीय बोझ |
| चुनाव पूर्व भत्ता वृद्धि | बजट दबाव बढ़ा |
कानून व्यवस्था और शासन की निरंतरता पर भी नजर
गौरतलब है कि बिहार में कानून व्यवस्था भी नई सरकार के लिए एक बड़ा मुद्दा बन चुकी है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि राज्य में अपराध और दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ी हैं। हाल के महीनों में मॉब लिंचिंग और हिंसा की घटनाओं ने भी सरकार पर दबाव बढ़ाया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सम्राट चौधरी के सामने सिर्फ अपराध नियंत्रण ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था में वही भरोसा कायम रखना भी चुनौती है जो पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में देखने को मिला था।
विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार की नौकरशाही पिछले दो दशकों में एक तय प्रशासनिक मॉडल पर काम करती रही है। अब लोगों के बीच यह सवाल है कि क्या नई सरकार उसी स्थिरता के साथ योजनाओं और प्रशासन को चला पाएगी या नहीं।
निवेश बढ़ाना और रोजगार लाना होगा अहम एजेंडा
बिहार में निवेश आकर्षित करना भी नई सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल माना जा रहा है। हालांकि राज्य सरकार पिछले कई वर्षों से निवेश लाने की कोशिश कर रही है, लेकिन अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि,
राज्य की कृषि आधारित अर्थव्यवस्था और समुद्री मार्ग से दूर होने के कारण बड़े निवेशक ज्यादा रुचि नहीं दिखाते। ऐसे में नई सरकार अब एग्रो-बेस्ड इंडस्ट्री पर फोकस कर सकती है।
उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने भी संकेत दिया है कि सरकार कृषि आधारित उद्योगों के जरिए निवेश बढ़ाने पर काम करेगी। वहीं उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने कहा है कि सरकार ‘नीतीश मॉडल’ पर चलते हुए विकास को आगे बढ़ाएगी।
क्या शराबबंदी कानून की होगी समीक्षा?
नई सरकार के सामने एक और बड़ा सवाल शराबबंदी कानून को लेकर है। NDA के कुछ सहयोगी दल पहले ही शराबबंदी कानून की समीक्षा की मांग उठा चुके हैं। ऐसे में आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार राजस्व बढ़ाने और कानून व्यवस्था सुधारने के लिए इस नीति पर कोई पुनर्विचार करती है या नहीं।
फिलहाल सम्राट चौधरी ने संकेत दिया है कि उनकी प्राथमिकता मौजूदा योजनाओं को गति देना और प्रशासनिक कामकाज को तेज करना है। लेकिन आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि उनकी सरकार राज्य के लिए कौन से नए फैसले लेती है।
