1 अप्रैल से देश में नए टैक्स नियम लागू! जानिए जमीन, प्रॉपर्टी और शेयर में निवेश करने वालों पर क्या पड़ेगा असर
अगर आपने जमीन खरीदी है, शेयर मार्केट में पैसा लगाया है या कोई और निवेश किया है, तो यह खबर आपके लिए बेहद जरूरी है। बता दें कि सरकार ने नए इनकम टैक्स नियम जारी कर दिए हैं, जो 1 अप्रैल 2026 से पूरे देश में लागू होंगे। गौरतलब है कि इन नए नियमों के बाद टैक्स की गणना का तरीका पहले से ज्यादा साफ और तय हो जाएगा।
क्या है नया टैक्स फॉर्मूला और कैसे होगा असर
सरकार द्वारा जारी किए गए नए इनकम टैक्स नियम (Income Tax Rules 2026) में सबसे अहम बदलाव “होल्डिंग पीरियड” को लेकर किया गया है। यानी आपने किसी संपत्ति या निवेश को कितने समय तक अपने पास रखा, उसी आधार पर टैक्स तय होगा।
हालांकि पहले कई मामलों में यह साफ नहीं था कि होल्डिंग पीरियड कब से गिना जाएगा। उदाहरण के लिए, अगर किसी ने बॉन्ड या डिबेंचर में निवेश किया और बाद में वह शेयर में बदल गया, तो निवेशकों को यह समझ नहीं आता था कि समय की गणना कब से होगी।
अब नए नियमों के तहत यह स्पष्ट कर दिया गया है कि ऐसे मामलों में होल्डिंग पीरियड सिर्फ शेयर बनने की तारीख से नहीं, बल्कि मूल निवेश यानी बॉन्ड या डिबेंचर खरीदने की तारीख से ही गिना जाएगा। इस बदलाव से निवेशकों को फायदा होगा, क्योंकि लंबी अवधि का निवेश दिखाकर टैक्स में राहत मिल सकती है।
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जमीन और मकान जैसे एसेट्स के लिए क्या बदला
सरकार ने जमीन, प्लॉट और मकान जैसे अचल संपत्तियों को लेकर भी स्थिति साफ कर दी है। खासतौर पर उन लोगों के लिए, जिन्होंने 2016 की आय घोषणा योजना के तहत अपनी संपत्ति घोषित की थी। बता दें कि अगर किसी व्यक्ति ने उस योजना के तहत कोई प्रॉपर्टी घोषित की थी, तो उसके होल्डिंग पीरियड की शुरुआत उसी दिन से मानी जाएगी, जब वह संपत्ति खरीदी गई थी।
हालांकि इसके लिए एक जरूरी शर्त रखी गई है कि उस संपत्ति का रजिस्टर्ड दस्तावेज मौजूद होना चाहिए। वहीं, अगर संपत्ति अचल नहीं है यानी कोई और एसेट है, तो उसके लिए होल्डिंग पीरियड 1 जून 2016 से माना जाएगा। इस फैसले से पुराने मामलों में टैक्स को लेकर जो कंफ्यूजन था, वह काफी हद तक खत्म हो जाएगा।
शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म टैक्स का झंझट खत्म
नए इनकम टैक्स नियम में सरकार ने शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन को लेकर भी साफ गाइडलाइन दी है। अगर किसी एसेट से होने वाला मुनाफा “ब्लॉक ऑफ एसेट”, खुद से बने एसेट जैसे गुडविल, या कम समय के एसेट से जुड़ा है, तो उसे शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन माना जाएगा।
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वहीं, लंबे समय तक रखे गए एसेट से होने वाला मुनाफा लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन के तहत आएगा और उसी के हिसाब से टैक्स लगेगा। इसके अलावा, एक और बड़ा बदलाव विदेशी कंपनियों के मामलों में किया गया है। अगर कोई विदेशी कंपनी भारत में अपनी ब्रांच को पूरी तरह से सब्सिडियरी में बदलती है, तो उस दौरान एसेट ट्रांसफर होता है।
अब ऐसे मामलों में एसेट का होल्डिंग पीरियड जोड़कर देखा जाएगा। यानी पहले जिस समय तक वह एसेट पुराने मालिक या ब्रांच के पास था, उसे भी शामिल किया जाएगा। गौरतलब है कि इससे टैक्स कैलकुलेशन ज्यादा आसान और पारदर्शी हो जाएगा।
