मिडिल ईस्ट तनाव के बीच सरकार का बड़ा फैसला, रसोई गैस उत्पादन अधिकतम स्तर तक बढ़ाने का आदेश
LPG Gas Emergency: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत सरकार ने रसोई गैस को लेकर बड़ा कदम उठाया है। सरकार ने अचानक इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करते हुए देश की सभी ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को LPG प्रोडक्शन बढ़ाने का आदेश दिया है। इसके लिए दो अहम गैसों प्रोपेन और ब्यूटेन के इस्तेमाल को लेकर भी सख्त निर्देश दिए गए हैं।
ऐसे में आइए जानते हैं की LPG में इस्तेमाल होने वाली ये गैसें आखिर क्या होती हैं और सरकार के इस फैसले का आम लोगों की रसोई पर क्या असर पड़ेगा।
सरकार ने क्यों लिया बड़ा फैसला?
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण दुनिया भर में ऊर्जा सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ रही है। भारत सरकार ने इस संभावित संकट को देखते हुए पहले ही एहतियाती कदम उठाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार ने इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल करते हुए देश की सभी ऑयल रिफाइनरी कंपनियों को आदेश दिया है कि वे LPG यानी रसोई गैस का उत्पादन अधिकतम स्तर तक बढ़ाएं।
इसके लिए खास तौर पर दो गैसों प्रोपेन और ब्यूटेन को केवल LPG बनाने के लिए इस्तेमाल करने को कहा गया है। इसका मतलब यह है कि फिलहाल इन गैसों का इस्तेमाल पेट्रोकेमिकल या अन्य औद्योगिक उत्पादों के लिए नहीं किया जाएगा।
सरकार का यह फैसला 5 मार्च की देर रात जारी किया गया। इसका उद्देश्य साफ है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में सप्लाई प्रभावित होती है तो भी भारत में घरेलू रसोई गैस की उपलब्धता पर कोई असर न पड़े।
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कैसे बनती है रसोई में इस्तेमाल होने वाली गैस?
रसोई में इस्तेमाल होने वाली LPG यानी तरलीकृत पेट्रोलियम गैस दरअसल दो मुख्य गैसों के मिश्रण से बनती है। ये गैसें हैं प्रोपेन और ब्यूटेन। इन दोनों गैसों को तेल शोधन कारखानों और गैस प्रसंस्करण संयंत्रों में विशेष प्रक्रिया से तैयार किया जाता है और फिर इन्हें तरल रूप में सिलेंडरों में भर दिया जाता है। यही सिलेंडर बाद में देशभर के घरों की रसोई तक पहुंचते हैं।
बता दें कि भारत में करीब 33 करोड़ से अधिक लोग एलपीजी सिलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए इसकी सप्लाई में जरा सी भी कमी लाखों नहीं बल्कि करोड़ों परिवारों की रसोई को प्रभावित कर सकती है। हालाकी हाल ही में सरकार ने नया आदेश जारी करते हुए कहा है कि प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का इस्तेमाल सबसे पहले एलपीजी बनाने में किया जाए।
साथ ही इन गैसों की सप्लाई इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, हिंदुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल कंपनियों को दी जाएगी, ताकि देश के आम उपभोक्ताओं तक गैस सिलेंडर की सप्लाई बिना किसी रुकावट के जारी रह सके।
मिडिल ईस्ट संकट से क्यों बढ़ी भारत की चिंता?
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव भारत के लिए बड़ी चिंता बन गया है। बता दें कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रसोई गैस आयात करने वाला देश है और घरेलू जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आने वाली सप्लाई पर निर्भर करता है। भारत को तेल और गैस का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट के देशों से मिलता है और यह सप्लाई मुख्य रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नाम के अहम समुद्री रास्ते से होकर आती है।
यह रास्ता दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा ट्रांजिट मार्गों में गिना जाता है। हालाकी इन दिनों ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव की वजह से इस इलाके में जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है। अगर यह रास्ता प्रभावित होता है तो तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक फिलहाल भारत के पास पर्याप्त तेल और गैस का भंडार मौजूद है और देश अब केवल एक ही सप्लाई स्रोत पर निर्भर भी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऊर्जा आयात के कई नए रास्ते भी बनाए हैं।
उदाहरण के तौर पर रूस से कच्चे तेल का आयात तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2022 में भारत अपनी जरूरत का सिर्फ 0.2 प्रतिशत तेल रूस से खरीदता था, जबकि अब यह हिस्सा बढ़कर करीब 20 प्रतिशत तक पहुंच चुका है।
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निजी कंपनियों पर क्या पड़ेगा असर?
सरकार के इस फैसले का असर कुछ निजी तेल रिफाइनरी कंपनियों पर भी पड़ सकता है। बता दें कि रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसी बड़ी कंपनियां प्रोपेन और ब्यूटेन गैस का इस्तेमाल कई पेट्रोकेमिकल उत्पाद बनाने में करती हैं। हालांकि अब सरकार ने इन गैसों को प्राथमिकता से LPG गैस बनाने में लगाने का निर्देश दिया है। ऐसे में कुछ पेट्रोकेमिकल उत्पादों का उत्पादन घट सकता है।
उदाहरण के तौर पर अल्काइलेट्स नाम का पदार्थ पेट्रोल की गुणवत्ता बेहतर करने में काम आता है और इसकी मांग भी ज्यादा रहती है। रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले साल रिलायंस हर महीने औसतन चार अल्काइलेट्स कार्गो विदेश भेजती थी, लेकिन अब प्रोपेन और ब्यूटेन का रुख एलपीजी की ओर मोड़ने से इन उत्पादों की उपलब्धता कम हो सकती है।
पॉलीप्रोपाइलीन और अल्काइलेट्स जैसे पेट्रोकेमिकल उत्पाद बाजार में एलपीजी से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं, इसलिए अगर इन गैसों का इस्तेमाल एलपीजी बनाने में ज्यादा होगा तो कंपनियों की कमाई पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल सरकार की प्राथमिकता यही है कि देश के करोड़ों घरों तक रसोई गैस सिलेंडर की सप्लाई बिना किसी रुकावट के पहुंचती रहे।
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
सरकार का कहना है कि यह फैसला किसी संकट के आने से पहले ही तैयारी के तौर पर लिया गया है ताकि देश में रसोई गैस की सप्लाई में कोई कमी न आए। बता दें कि अगर समय रहते यह कदम नहीं उठाया जाता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सप्लाई में रुकावट आ जाती, तो देश में गैस की कमी के साथ-साथ सिलेंडर की कीमतों में भी तेजी देखने को मिल सकती थी।
फिलहाल सरकार का दावा है कि देश में रसोई गैस का पर्याप्त भंडार मौजूद है और जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त सप्लाई के इंतजाम भी किए जा रहे हैं। हालांकि गौरतलब है कि अगर मिडिल ईस्ट में चल रहा तनाव लंबे समय तक जारी रहता है तो आने वाले महीनों में वैश्विक गैस बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार का यह कदम भविष्य में संभावित संकट से आम उपभोक्ताओं को बचाने की दिशा में एक अहम तैयारी है।
