ईरान युद्ध से हिला तेल बाजार, देश की बड़ी तेल कंपनियां रोज़ उठा रहीं 1600 करोड़ का नुकसान

Iran War Impact on Oil Prices in India
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ईरान युद्ध के बीच दुनिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन भारत में दाम अब तक स्थिर बने हुए हैं। क्या आपने सोचा है कि आखिर ऐसा कैसे संभव हो रहा है? दरअसल इसके पीछे एक बड़ा आर्थिक सच छिपा है, जिसे जानकर आप हैरान रह जाएंगे। सरकारी तेल कंपनियां आम लोगों को राहत देने के लिए हर दिन हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठा रही हैं। आखिर यह स्थिति कब तक चलेगी, जानिए पूरी कहानी।

भारत में क्यों स्थिर हैं पेट्रोल-डीजल के दाम?

भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है, इसलिए जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो उसका असर भारत पर भी पड़ना तय माना जाता है। इस समय वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमत 85 से 90 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है और पिछले कुछ हफ्तों में इसमें 10 से 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

हालांकि इतनी तेजी के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में अभी तक कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। बता दें कि आखिरी बार अप्रैल 2022 में ईंधन कीमतों में व्यापक संशोधन किया गया था। वहीं अगर भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय लागत के आधार पर तय किए जाते, तो आज पेट्रोल करीब 113 रुपये प्रति लीटर और डीजल लगभग 123 रुपये प्रति लीटर बिक रहा होता।

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तेल कंपनियों को रोज़ कितना नुकसान हो रहा है?

देश की सरकारी तेल कंपनियां इस समय बाजार कीमत से कम दाम पर पेट्रोल और डीजल बेच रही हैं, जिसकी वजह से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। हालात ऐसे हैं कि पेट्रोल बेचने पर कंपनियों को करीब 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 35 रुपये प्रति लीटर का घाटा हो रहा है।

बता दें कि यह नुकसान सिर्फ छोटे स्तर का नहीं है, बल्कि तीनों बड़ी सरकारी कंपनियां मिलकर रोजाना करीब 1,600 करोड़ रुपये गंवा रही (Iran War Impact on Oil Prices) हैं। इस पूरे बोझ को मुख्य रूप से इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन उठा रही हैं, क्योंकि देश में पेट्रोल-डीजल की सबसे ज्यादा बिक्री इन्हीं के जरिए होती है।

जानकारों का मानना है कि अगर यही स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो इन कंपनियों का मासिक घाटा 45 हजार करोड़ से 50 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।

सरकार क्यों नहीं बढ़ा रही पेट्रोल-डीजल के दाम?

विशेषज्ञों के अनुसार सरकार फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतें इसलिए नहीं बढ़ा रही क्योंकि इससे महंगाई तेजी से बढ़ सकती है। बता दें कि ईंधन महंगा होने पर माल ढुलाई और परिवहन का खर्च बढ़ जाता है, जिसका असर सब्जी, राशन, दूध और रोजमर्रा की लगभग हर चीज की कीमत पर पड़ता है।

इसी कारण ईरान युद्ध के बाद सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क में कटौती भी की थी ताकि आम लोगों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े, हालांकि इससे सरकार की कमाई पर असर पड़ा है।

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ऊर्जा विशेषज्ञ सिद्धार्थ मौर्य का कहना है कि,

अभी कीमतें नियंत्रित रखने से महंगाई काबू में है, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना आसान नहीं होगा। अगर पेट्रोल-डीजल में प्रति लीटर एक रुपये की मामूली बढ़ोतरी भी की जाए तो तेल कंपनियों के घाटे को कुछ राहत मिल सकती है। साथ ही लगातार नुकसान होने से तेल कंपनियों की नई रिफाइनरी और ऊर्जा परियोजनाओं में निवेश करने की क्षमता भी कमजोर पड़ सकती है।

आगे क्या हो सकता है?

जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, क्योंकि मध्य पूर्व में जारी तनाव और अमेरिका, ईरान तथा इजरायल के बीच चल रही बातचीत का असर वैश्विक बाजार पर लगातार पड़ रहा है। हालांकि दो सप्ताह के युद्धविराम और स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ के आंशिक रूप से खुलने से तेल की कीमतों में थोड़ी राहत देखने को मिली है।

लेकिन यदि क्षेत्र में तनाव दोबारा बढ़ता है तो कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। ऐसी स्थिति बनने पर भारत में भी पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है और आने वाले दिनों में आम लोगों को महंगे ईंधन का सामना करना पड़ सकता है।

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