ब्रह्मपुत्र के नीचे बनेगी भारत की पहली रोड-रेल टनल, ₹18,662 करोड़ की मेगा परियोजना से बदलेगा नॉर्थईस्ट

ब्रह्मपुत्र के नीचे बनेगी भारत की पहली रोड-रेल टनल, ₹18,662 करोड़ की मेगा परियोजना से बदलेगा नॉर्थईस्ट

Brahmaputra Tunnel Project: भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है। केंद्र सरकार ने असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे भारत की पहली अंडरवॉटर रोड-रेल टनल को मंजूरी दे दी है। खास बात है कि यह परियोजना न सिर्फ देश की पहली ऐसी सुरंग होगी, बल्कि दुनिया की दूसरी अंडरवॉटर रोड-रेल टनल भी मानी जा रही है। इस महत्वाकांक्षी योजना पर कुल ₹18,662 करोड़ खर्च होंगे और इसके पूरा होते ही नॉर्थईस्ट की कनेक्टिविटी पूरी तरह बदल जाएगी।

क्या है ब्रह्मपुत्र टनल परियोजना?

ब्रह्मपुत्र टनल परियोजना के तहत असम के गोहपुर और नुमालीगढ़ के बीच चार लेन वाला नियंत्रित प्रवेश हरित क्षेत्र मार्ग बनाया जाएगा। अभी नुमालीगढ़ NH-715 से गोहपुर NH-15 तक करीब 240 किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग छह घंटे लगते हैं और रास्ता कालीआभामोरा, सिलघाट और राष्ट्रीय राजमार्ग 52 से होकर गुजरता है, जहां अक्सर यातायात जाम बड़ी परेशानी बन जाता है।

नई सुरंग और इस नए मार्ग के तैयार होने के बाद यह लंबा और थकाऊ सफर काफी छोटा हो जाएगा, जिससे आम लोगों और माल ढुलाई दोनों को बड़ी राहत मिलेगी

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कैबिनेट से मिली हरी झंडी

इस योजना को आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने मंजूरी दे दी है और सड़क का निर्माण अभियांत्रिकी, खरीद और निर्माण मॉडल पर किया जाएगा। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार यह मार्ग आधुनिक मानकों के अनुसार बनाया जाएगा, ताकि यात्रा तेज, सुरक्षित और बिना रुकावट के हो सके।

काजीरंगा से नॉर्थईस्ट तक बदलेगा सफर

मौजूदा मार्ग नुमालीगढ़ से होकर काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और बिस्वनाथ शहर से गुजरता है, जहां पर्यावरण और यातायात से जुड़ी दिक्कतें अक्सर सामने आती हैं, हालांकि नई ग्रीनफील्ड सड़क बनने के बाद नेशनल पार्क क्षेत्र पर दबाव कम होगा और लोगों का सफर पहले से कहीं ज्यादा आसान और सुगम बन सकेगा।

Brahmaputra Tunnel Project का सीधा फायदा सिर्फ असम को ही नहीं, बल्कि अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र को मिलने वाला है, क्योंकि इससे लॉजिस्टिक्स की लागत घटेगी, माल ढुलाई तेज होगी और सामाजिक व आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी। गौरतलब है कि सरकार इस कॉरिडोर को भविष्य के विकास का आधार मान रही है, क्योंकि यह व्यापार, उद्योग और निवेश के नए रास्ते खोल सकता है।

मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी पर फोकस

बता दें कि ब्रह्मपुत्र टनल परियोजना सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके जरिए 11 आर्थिक केंद्र, तीन सामाजिक केंद्र, दो पर्यटन केंद्र और आठ लॉजिस्टिक केंद्र आपस में जुड़ेंगे, साथ ही चार बड़े रेलवे स्टेशन, दो हवाई अड्डे और दो अंतर्देशीय जलमार्गों से संपर्क बेहतर होगा, यही वजह है कि इसे बहु-माध्यम कनेक्टिविटी का मजबूत उदाहरण माना जा रहा है।

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रणनीतिक दृष्टि से क्यों अहम है प्रोजेक्ट

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नॉर्थईस्ट में पहली आपातकालीन लैंडिंग पट्टी पर सी-130 जे सैन्य विमान से ऐतिहासिक लैंडिंग कर यह साफ कर दिया कि यह इलाका रणनीतिक दृष्टि से कितना अहम है। यह आपातकालीन लैंडिंग फील्ड डिब्रूगढ़-मोरान मार्ग पर स्थित है और चीन फैक्टर को देखते हुए इसकी भूमिका और भी बढ़ जाती है, क्योंकि जरूरत पड़ने पर यहां भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमान और परिवहन विमान आसानी से उतर सकते हैं।

ऐसी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं नॉर्थईस्ट की सुरक्षा, सैन्य तैयारियों और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत करती हैं। हालांकि इस मेगा परियोजना को पूरी तरह आकार लेने में समय लगेगा, लेकिन इसके पूरा होते ही नॉर्थईस्ट भारत की कनेक्टिविटी, व्यापार और रणनीतिक स्थिति में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा।

ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे बनने वाली यह रोड-रेल सुरंग (Brahmaputra Tunnel Project) न सिर्फ इंजीनियरिंग का चमत्कार होगी, बल्कि देश के विकास और सुरक्षा से जुड़ी यात्रा में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर भी साबित होगी।

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