नवरात्र में आखिर क्यों बोए जाते हैं जौ? 9 दिन बाद दिखे ये संकेत, तो माना जाता है शुभ

Navratri Me Jau Ka Mahatva: नवरात्र में जौ उगाने की परंपरा का क्या है रहस्य?
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Navratri Me Jau Ka Mahatva: शारदीय नवरात्र शुरू होते ही घरों और मंदिरों में कलश स्थापना के साथ जौ बोने की परंपरा भी निभाई जाती है। मिट्टी के छोटे बर्तन में बोए गए ये दाने नौ दिनों में हरे अंकुर बन जाते हैं। मान्यता है कि इन अंकुरों का संबंध घर की सुख-समृद्धि और आने वाले समय से होता है। ऐसे में जानिए इस परंपरा का धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व।

नवरात्र में जौ क्यों बोए जाते हैं?

नवरात्र में मां दुर्गा की पूजा शक्ति के साथ अन्नपूर्णा स्वरूप में भी की जाती है। ऐसे में जौ बोना अन्न के प्रति सम्मान और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है। कलश स्थापना के समय मिट्टी से भरे बर्तन में जौ के दाने डाले जाते हैं और इसे पूरे नौ दिनों तक पूजा स्थल पर रखा जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार जौ को सृष्टि की पहली फसल माना गया है। इसी वजह से यज्ञ, तर्पण और कई धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसका इस्तेमाल होता है। नवरात्र में देवी की स्थापना के साथ जौ बोने का अर्थ सृष्टि के आरंभ और जीवन के नए चक्र से जोड़ा जाता है।

यह परंपरा केवल पूजा की सजावट नहीं मानी जाती। इसके पीछे यह भावना भी है कि घर में अन्न की कमी न हो और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे। इसी कारण कई परिवार कलश के पास ही जौ का बर्तन रखते हैं।

हरे जौ के अंकुरों को शुभ क्यों माना जाता है?

नवरात्र के दौरान जौ तेजी से बढ़कर हरे अंकुर में बदलते हैं। पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार यदि अंकुर अच्छी तरह बढ़ें और हरे-भरे रहें तो इसे घर के लिए शुभ संकेत माना जाता है। वहीं, अंकुर कमजोर होने या पीले पड़ने को कुछ जगहों पर आने वाली परेशानी से जोड़ा जाता है।

हालांकि, यह पूरी तरह आस्था से जुड़ी मान्यता है। जौ के अंकुरों की स्थिति केवल भविष्य का संकेत नहीं बताती। उनके बढ़ने पर मौसम, मिट्टी, पानी और रोशनी का भी असर पड़ता है।

वैज्ञानिक नजर से देखें तो जौ ठंडे मौसम में अच्छी तरह उगने वाली फसल है। मिट्टी में हल्की नमी रहने पर दाने आसानी से अंकुरित हो सकते हैं। अगर पानी बहुत ज्यादा डाल दिया जाए तो बीज खराब या सड़ सकते हैं। इसी तरह पर्याप्त रोशनी न मिलने पर अंकुर पतले और पीले दिखाई दे सकते हैं।

इसलिए अंकुरों के कमजोर होने पर घबराने की जरूरत नहीं है। पूजा और आस्था अपनी जगह है, जबकि पौधे की स्थिति उसके प्राकृतिक वातावरण पर भी निर्भर करती है।

नवरात्र में जौ बोने का सही तरीका क्या है?

जौ बोने के लिए सबसे पहले साफ मिट्टी वाला मिट्टी का बर्तन लें। इसमें मिट्टी भरकर साफ और साबुत जौ के दाने बिखेरें। इसके ऊपर हल्की मिट्टी डालकर कलश स्थापना के दिन इसे पूजा स्थान पर रख सकते हैं।

जौ में रोज थोड़ा पानी डालना पर्याप्त है। मिट्टी नम रहनी चाहिए, लेकिन उसमें पानी जमा नहीं होना चाहिए। बर्तन को ऐसी जगह रखना बेहतर है, जहां हल्की प्राकृतिक रोशनी आती हो। बहुत कम रोशनी में अंकुर पीले और कमजोर हो सकते हैं।

जौ के लिए साफ और अच्छी गुणवत्ता वाले दाने इस्तेमाल करना भी जरूरी है। बहुत पुराने, टूटे या नमी से खराब हुए दाने ठीक से अंकुरित नहीं हो सकते। बर्तन को पहले अच्छी तरह साफ और सुखा लें, ताकि फफूंद की समस्या न हो।

नौ दिन बाद जौ के अंकुरों का क्या किया जाता है?

नवरात्र के नौ दिन पूरे होने के बाद कई परिवार इन हरे अंकुरों को प्रसाद के रूप में बांटते हैं। कुछ लोग इन्हें पूजा घर या तिजोरी में रखते हैं, जबकि कुछ परिवार धार्मिक परंपरा के अनुसार इन्हें बहते जल में प्रवाहित करते हैं।

अगर जौ को जल में प्रवाहित किया जाए तो प्लास्टिक, गमले या अतिरिक्त मिट्टी को नदी में नहीं डालना चाहिए। केवल जैविक अंकुर ही पानी में छोड़ना उचित है। वहीं, घर में रखने वाले लोग इन्हें सूखने के बाद पूजा की थाली या पूजा स्थल पर रख सकते हैं।

दरअसल, नवरात्र में जौ उगाने की परंपरा धार्मिक आस्था और खेती से जुड़ी पुरानी समझ दोनों को जोड़ती है। शरद ऋतु में जौ के अंकुर आसानी से निकलते हैं, इसलिए नौ दिनों में इनके हरे होने की प्रक्रिया भी दिखाई देती है। यही छोटा सा बर्तन कई परिवारों के लिए खेत, अन्न और समृद्धि का प्रतीक बन जाता है।

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Adarsh Pandey

Founder & Editor, जय जगदम्बा न्यूज
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