अब भारतीय राइफल से लैस होगी ब्रिटिश आर्मी, ब्रिटेन के 2 लाख राइफलों की डील में भारत लेगा हिस्सा

Indian Small Arms Maker Bids for UK Project Grayburn
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UK Project Grayburn: क्या अब भारतीय राइफल से लैस होगी ब्रिटिश आर्मी? सुनने में हैरानी होती है, लेकिन बेंगलुरु की SSS डिफेन्स ने यूके के बड़े रक्षा प्रोजेक्ट ग्रेबर्न में हिस्सा लेने का ऐलान कर दिया है। ये वही प्रोजेक्ट है जो दशकों पुरानी SA80 राइफलों को बदलने वाला है। हालाकी मुकाबला आसान नहीं होगा, लेकिन भारतीय कंपनी का यह कदम रक्षा क्षेत्र में देश की बढ़ती ताकत का साफ संकेत दे रहा है। पूरी कहानी जानना आपके लिए भी दिलचस्प होगा।

क्या है ब्रिटेन का प्रोजेक्ट ग्रेबर्न?

ब्रिटेन का रक्षा मंत्रालय (UK Ministry of Defence) ने हाल ही में ‘प्रोजेक्ट ग्रेबर्न’ के लिए प्रारंभिक अवधारणा चरण की सूचना जारी की है, जिसका सीधा मकसद ब्रिटिश सेना की कई दशक पुरानी एसए 80 राइफल श्रृंखला को बदलना है। यह वही राइफल है जो 1980 के दशक से सेना में इस्तेमाल हो रही है और उत्तरी आयरलैंड, इराक और अफगानिस्तान जैसे इलाकों में तैनात सैनिकों के हाथ में नजर आई है। लेकिन समय के साथ युद्ध का तरीका बदल गया है।

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अब सेना को ऐसी नई पीढ़ी की राइफल चाहिए जो ज्यादा हल्की हो, अलग-अलग हिस्सों में बदली जा सके, साइलेंसर के साथ बेहतर काम करे और उत्तरी अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो के मानकों के अनुसार हो। हालाकी एसए 80 के एल 85 ए 3 संस्करण में सुधार किए गए हैं, फिर भी बदलते युद्ध हालात, शहरी अभियान और नई तरह की चुनौतियों ने इस नई राइफल योजना को बेहद खास और जरूरी बना दिया है।

कितनी बड़ी है यह डील?

ब्रिटेन के प्रोजेक्ट ग्रेबर्न के तहत करीब दो लाख नई राइफलों की खरीद की तैयारी है, जिसकी अवधि 1 अप्रैल 2028 से 31 मार्च 2045 तक यानी पूरे 17 साल रहने का अनुमान है। बता दें कि यह सौदा छोटा नहीं है, क्योंकि इसमें पांच तरह की राइफलें बनाई जाएंगी, जिनमें नजदीकी मुकाबले की राइफल, उसका छोटा संस्करण, व्यक्तिगत सुरक्षा हथियार, सामान्य उपयोग राइफल और कैडेट राइफल शामिल होंगी।

इन सभी राइफलों का निर्माण ब्रिटेन में ही किया जाएगा, ताकि वहां की आपूर्ति व्यवस्था मजबूत हो और स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। इसी बीच बेंगलुरु की कंपनी एसएसएस डिफेंस ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साफ कहा है कि,

उसने यूनाइटेड किंगडम रक्षा मंत्रालय के प्रोजेक्ट ग्रेबर्न में हिस्सा लेने का पक्का फैसला कर लिया है। उसने भारत में सफल आपूर्ति की है और अपने हथियारों की बनावट, निर्माण गुणवत्ता और युद्ध क्षेत्र में भरोसेमंद प्रदर्शन पर उसे पूरा विश्वास है।

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गौरतलब है कि शुरुआती चरण में ही ऐसा सार्वजनिक ऐलान करना यह दिखाता है कि कंपनी औपचारिक बोली से पहले ही मजबूत दावेदारी जताना चाहती है।

कौन है SSS Defence?

कर्नाटक की राजधानी Bengaluru में स्थित SSS Defence एक निजी भारतीय रक्षा कंपनी है, जो आधुनिक और मॉड्यूलर राइफलों, दृष्टि उपकरणों और हथियारों से जुड़े अन्य साजो-सामान बनाने में माहिर मानी जाती है। बता दें कि इस कंपनी ने भारतीय सेना के लिए एके-47 राइफलों के स्वदेशी उन्नयन किट तैयार किए, जिससे पकड़ मजबूत हुई और निशाना ज्यादा सटीक बना।

कंपनी ने पी-72 असॉल्ट राइफल भी विकसित की है, जिसकी आपूर्ति कई राज्यों की विशेष कार्य बल इकाइयों को की जा चुकी है। गौरतलब है कि एसएसएस डिफेंस पहले ही स्नाइपर राइफलों और गोला-बारूद का निर्यात कर चुकी है, जिससे साफ है कि यह कंपनी अब देश के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी मजबूत पहचान बना रही है।

क्या ब्रिटेन की Project Grayburn से बदलेगी भारत की रक्षा पहचान?

ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के “प्रोजेक्ट ग्रेबर्न” में एक भारतीय हथियार निर्माता कंपनी का उतरना सिर्फ एक व्यापारिक फैसला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारत की बढ़ती रक्षा निर्माण ताकत के बड़े संकेत के रूप में देखा जा रहा है। हालाकी ब्रिटेन ने साफ कर दिया है कि नई राइफलों का निर्माण अपने देश में ही होगा, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के साथ साझेदारी के दरवाजे खुले हैं।

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ऐसे में अगर SSS डिफेन्स इस कड़ी प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ती है, तो यह भारतीय निजी रक्षा कंपनियों के लिए नई संभावनाओं का रास्ता खोल सकता है। फिलहाल बोली प्रक्रिया शुरुआती दौर में है और आगे तकनीकी जांच, मानकों की परख और कई चरणों की होड़ होगी, लेकिन इतना तय है कि भारत अब सिर्फ अपने लिए हथियार बनाने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि दुनिया के रक्षा बाजार में भी अपनी मजबूत पहचान बनाना चाहता है।

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