शरीर पर ‘राम’ नाम गुदवाकर बनाया मंदिर, छत्तीसगढ़ के रामनामी समाज की कहानी जानकर रह जाएंगे हैरान

Chhattisgarh Ramnaami Samaj: छत्तीसगढ़ का रामनामी समाज भक्ति की ऐसी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है, जिसमें लोग अपने शरीर पर ‘राम’ नाम गुदवाते हैं। करीब 130 साल पुरानी यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि सामाजिक भेदभाव और छुआछूत के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध का प्रतीक भी मानी जाती है।
महानदी के किनारे बसा है रामनामी समाज
रामनामी समाज के लोग मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के महानदी के मैदानी और आसपास के इलाकों में रहते हैं। जांजगीर-चांपा, बिलासपुर, सारंगढ़-बिलाईगढ़, बलौदाबाजार और रायपुर इसके प्रमुख क्षेत्र हैं। इस समुदाय की भक्ति में साकार रूप से अधिक निराकार राम की मान्यता दिखाई देती है। इसकी विचारधारा पर कबीर की निर्गुण भक्ति परंपरा का प्रभाव भी माना जाता है।
रामनामी समाज के लोग साधारण और सात्विक जीवन जीने पर जोर देते हैं। पारंपरिक रूप से वे सफेद कपड़े पहनते हैं, जिन पर ‘राम-राम’ लिखा होता है। सिर पर मोरपंखों का मुकुट और गले में घुंघरू उनकी खास पहचान माने जाते हैं। खंजरी और मंजीरे की धुन के साथ जब वे रामचरितमानस की चौपाइयां गाते हैं तो भक्ति का अलग ही वातावरण बन जाता है।
इनकी रामभक्ति केवल कपड़ों तक सीमित नहीं है। घरों की दीवारों, दरवाजों, बिस्तरों और कई घरेलू सामानों पर भी राम नाम लिखा हुआ दिखाई देता है।
1890 के आसपास शुरू हुई थी यह परंपरा
रामनामी समाज की शुरुआत लगभग 1890 के आसपास सारंगढ़ क्षेत्र के चारपारा गांव से जुड़ी मानी जाती है। इसके पीछे परशुराम भारद्वाज का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। ऐतिहासिक और मौखिक विवरणों के अनुसार, उस समय वे कुष्ठ रोग से पीड़ित थे और जातिगत भेदभाव के कारण उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा।
उस दौर में समाज के वंचित वर्गों के लिए मंदिरों में प्रवेश और धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन पर कई तरह की पाबंदियां थीं। बताया जाता है कि एक सिद्ध संत की प्रेरणा से परशुराम ने लगातार राम नाम का जाप शुरू किया। इसके बाद उनके जीवन में आए आध्यात्मिक अनुभव ने उनकी सोच बदल दी।
जब उन्हें राम मंदिर में प्रवेश करने से रोका गया, तब उन्होंने अपने शरीर पर ‘राम’ नाम गुदवाने का फैसला किया। उनका विचार था कि यदि शरीर को ही राम का मंदिर बना लिया जाए, तो किसी बाहरी मंदिर में प्रवेश की जरूरत नहीं रहेगी। इसी सोच ने आगे चलकर कई लोगों को प्रभावित किया और रामनामी समाज की परंपरा मजबूत होती गई।
शरीर पर राम नाम गुदवाने के पीछे क्या है संदेश?
रामनामी समाज में शरीर पर राम नाम गुदवाना केवल धार्मिक पहचान नहीं माना जाता। इसे सामाजिक भेदभाव के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से अपनी गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता जताने का माध्यम भी समझा जाता है। समुदाय ने बिना हिंसा के यह संदेश दिया कि ईश्वर तक पहुंचने का अधिकार किसी जाति या वर्ग तक सीमित नहीं हो सकता।
राम नाम का गोदना करवाना आसान नहीं होता। पारंपरिक प्रक्रिया में मिट्टी के तेल या दीये की कालिख से तैयार सामग्री और बबूल के कांटों या सुइयों की मदद से त्वचा पर नाम अंकित किया जाता था। इस दौरान होने वाला दर्द भी साधक की आस्था और संकल्प का हिस्सा माना जाता है।
राम नाम के गोदने से मिलती है अलग-अलग पहचान
समुदाय में शरीर पर लिखे गए राम नाम के आधार पर अलग-अलग पहचान भी बताई जाती है। माथे पर दो राम नाम वाले व्यक्ति को ‘शिरोमणि’ कहा जाता है। पूरे माथे पर राम नाम अंकित करवाने वाले ‘माथौते’ कहलाते हैं। छाती, पीठ और कंधों पर राम नाम लिखवाने वाले ‘वराहा’ कहे जाते हैं।
वहीं, जो साधक चेहरे से लेकर पलकों, कान, हाथ, पैर और हथेलियों तक पूरे शरीर पर राम नाम गुदवाते हैं, उन्हें ‘नखशिख’ या ‘पूर्ण रामनामी’ कहा जाता है। पूर्ण रामनामी बनना लंबे समय की साधना, त्याग और शारीरिक पीड़ा सहने की क्षमता से जुड़ा माना जाता है।
आज भी रामनामी समाज की यह परंपरा छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके मेलों और सामूहिक आयोजनों में बड़ी संख्या में लोग राम नाम का गायन करते हैं। यह परंपरा बताती है कि भक्ति केवल मंदिर, मूर्ति या बाहरी कर्मकांड तक सीमित नहीं होती। रामनामी समाज के लिए उनका शरीर ही आस्था का स्थान है और ‘राम’ नाम उनकी सबसे बड़ी पहचान।
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