चांद पर परमाणु रिएक्टर क्यों लगा रहे हैं अमेरिका, रूस और चीन? 14 दिन की रात है सबसे बड़ी वजह

Moon Nuclear Reactor: चांद पर इंसानों की स्थायी मौजूदगी की तैयारी अब सिर्फ अंतरिक्ष मिशन तक सीमित नहीं रह गई है। अमेरिका, रूस और चीन वहां लगातार बिजली उपलब्ध कराने के लिए छोटे परमाणु रिएक्टर लगाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। सवाल यह है कि आखिर चांद पर सौर ऊर्जा के बजाय परमाणु ऊर्जा की जरूरत क्यों पड़ रही है?
अमेरिका चांद पर पहुंचाना चाहता है परमाणु रिएक्टर
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और अमेरिकी ऊर्जा विभाग चांद की सतह पर इस्तेमाल होने वाले फिशन पावर सिस्टम पर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य भविष्य के चंद्र बेस को लगातार बिजली उपलब्ध कराना है। यह योजना नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम से भी जुड़ी है, जिसके तहत चांद पर इंसानों की वापसी के साथ लंबे समय तक रहने की तैयारी की जा रही है।
अमेरिका लगभग 20 किलोवाट बिजली पैदा करने वाले रिएक्टर पर काम कर रहा है। इसे इस तरह तैयार किया जा रहा है कि यह कम से कम पांच साल तक बिना किसी इंसानी रखरखाव के अपने आप काम कर सके। इसका आकार और वजन भी ऐसा रखने की कोशिश है कि इसे व्यावसायिक रॉकेट की मदद से चांद तक पहुंचाया जा सके।
नासा की नजर खास तौर पर चांद के दक्षिणी ध्रुव पर है। यहां कुछ ऐसे गड्ढे हैं जहां सूर्य की रोशनी लंबे समय तक या कभी नहीं पहुंचती। ऐसे इलाकों में केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना काफी मुश्किल हो सकता है।
रूस और चीन भी बना रहे हैं अपना चंद्र परमाणु सिस्टम
अमेरिका के साथ-साथ रूस और चीन भी चांद पर भविष्य के ठिकानों के लिए ऊर्जा व्यवस्था तैयार कर रहे हैं। रूस की अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस और चीन का राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन इंटरनेशनल लूनर रिसर्च स्टेशन यानी ILRS पर सहयोग कर रहे हैं।
इस साझेदारी के तहत रूस वर्ष 2036 तक ‘सेलेना’ नाम के लूनर न्यूक्लियर रिएक्टर को विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। इसकी प्रस्तावित क्षमता करीब 10 किलोवाट बताई गई है। इसे चांद की सतह पर रोबोटिक सिस्टम की मदद से असेंबल और चालू करने की योजना है।
रूस और चीन भी चांद के दक्षिणी ध्रुव को महत्वपूर्ण मानते हैं। इसकी एक बड़ी वजह वहां मौजूद बर्फ और जमे हुए पानी के संभावित भंडार हैं। भविष्य में पानी से ऑक्सीजन और हाइड्रोजन जैसे संसाधन हासिल करने के लिए लगातार बिजली की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे काम के लिए परमाणु ऊर्जा एक महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती है।
चांद की 14 दिन लंबी रात बढ़ाती है परमाणु ऊर्जा की जरूरत
चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाने की सबसे बड़ी वजह उसका लंबा दिन-रात चक्र है। चांद पर एक पूरा दिन लगभग 28 पृथ्वी के दिनों के बराबर होता है। इसमें करीब 14 दिन लगातार रोशनी और फिर लगभग 14 दिन लगातार अंधेरा रहता है।
चंद्र रात के दौरान तापमान लगभग माइनस 130 डिग्री सेल्सियस से लेकर माइनस 200 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। इस दौरान सौर पैनल बिजली पैदा करने में सक्षम नहीं होंगे। केवल बैटरियों के सहारे करीब दो सप्ताह तक बेस की हीटिंग, लाइफ सपोर्ट और संचार व्यवस्था चलाना बड़ी चुनौती होगी।
परमाणु रिएक्टर इस समस्या का समाधान दे सकता है, क्योंकि उसे सूर्य की रोशनी की जरूरत नहीं होती। इससे चंद्र बेस को लगातार बिजली मिल सकती है। हालांकि, इसके साथ सुरक्षा की चुनौती भी जुड़ी है।
रॉकेट सुरक्षा से अंतरिक्ष कानून तक, क्या बढ़ेगा विवाद?
पृथ्वी से रिएक्टर को चांद तक पहुंचाने के दौरान रॉकेट दुर्घटना का जोखिम सबसे महत्वपूर्ण चिंताओं में से एक है। इसलिए रिएक्टर को यात्रा के दौरान निष्क्रिय अवस्था में रखने और यूरेनियम ईंधन को मजबूत सुरक्षा कवच में रखने की योजना बनाई जा रही है। वास्तविक परमाणु विखंडन प्रक्रिया चांद पर सुरक्षित लैंडिंग के बाद शुरू की जा सकती है।
इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय कानून भी भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी के अनुसार चांद किसी एक देश की संप्रभु संपत्ति नहीं है। लेकिन परमाणु रिएक्टरों के आसपास सुरक्षा क्षेत्र बनाए जाने पर यह सवाल उठ सकता है कि क्या ऐसे क्षेत्र किसी देश को चांद के महत्वपूर्ण हिस्सों पर व्यावहारिक नियंत्रण देने लगेंगे। पानी और खनिज संसाधनों वाले क्षेत्रों को लेकर यह मुद्दा आने वाले वर्षों में अंतरराष्ट्रीय तनाव का कारण बन सकता है।
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