NASA की चेतावनी! अनुमान से 10 गुना तेजी से पिघल रहा है ‘प्रलय का ग्लेशियर’, नक्शे से गायब हो जाएंगे कई शहर!

Thwaites Doomsday Glacier: वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका को लेकर एक बेहद डरावनी चेतावनी जारी की है। एक नई सैटेलाइट स्टडी में सामने आया है कि अंटार्कटिका में मौजूद थ्वाइट्स ग्लेशियर (Thwaites Glacier), जिसे दुनिया ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ (Doomsday Glacier) यानी प्रलय का ग्लेशियर कहती है, वैज्ञानिकों के पुराने अनुमानों से कहीं ज्यादा तेजी से पिघल रहा है।
नासा (NASA) और यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के वैज्ञानिकों का कहना है कि इसके पिघलने की रफ्तार इतनी खतरनाक है कि दुनिया भर के तटीय शहरों के डूबने का खतरा अब बहुत करीब आ चुका है।
थ्वाइट्स ग्लेशियर क्यों है खतरनाक?
पश्चिमी अंटार्कटिका में मौजूद थ्वाइट्स ग्लेशियर दुनिया के सबसे चौड़े ग्लेशियरों में से एक है। इसे ‘डूम्सडे ग्लेशियर’ यानी प्रलय का ग्लेशियर भी कहा जाता है। इसकी वजह है इसके पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ने और दुनिया के तटीय इलाकों में बाढ़ का खतरा पैदा होना।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, वैश्विक समुद्र स्तर में हो रही बढ़ोतरी में थ्वाइट्स ग्लेशियर का योगदान करीब 4 प्रतिशत है। पिछले कई दशकों से यह ग्लेशियर लगातार पीछे हट रहा है। अब Nature Communications जर्नल में प्रकाशित एक नई स्टडी ने इसके पिघलने को लेकर चिंता और बढ़ा दी है।
वर्ष 2100 तक कितना बढ़ेगा समुद्र का जलस्तर?
स्टडी के अनुसार, वर्ष 2100 तक थ्वाइट्स ग्लेशियर समुद्र का जलस्तर करीब 1.2 इंच बढ़ाने में योगदान दे सकता है। खास बात यह है कि यह अनुमान ग्लोबल वार्मिंग में आगे कोई अतिरिक्त बढ़ोतरी नहीं होने की स्थिति में भी लगाया गया है।
हालांकि, ग्लेशियर के पूरी तरह ढहने का असर इससे कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि थ्वाइट्स ग्लेशियर में इतनी बर्फ मौजूद है कि इसके पूरी तरह ढहने पर वैश्विक समुद्र का जलस्तर दो फीट से अधिक बढ़ सकता है। इससे दुनिया के कई तटीय शहरों और समुद्र के करीब बसे इलाकों में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
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इसका असर केवल थ्वाइट्स ग्लेशियर तक सीमित रहने की आशंका नहीं है। इसके ढहने से पश्चिमी अंटार्कटिका की बर्फ की दूसरी बड़ी चादरें भी अस्थिर हो सकती हैं, जिससे समुद्र का जलस्तर कई फीट तक बढ़ने का खतरा पैदा हो सकता है।
इस स्टडी को यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, इरविन और नासा की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ग्लेशियर के पिघलने की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझना भविष्य में समुद्र के बढ़ते जलस्तर और तटीय इलाकों पर पड़ने वाले इसके प्रभावों का अनुमान लगाने के लिए जरूरी है।
A Massive Glacier Slab Slices Into the Sea! 🧊🌊 | A Rare Ice Collapse Sends a Towering Water Column Skyward Before the Glacier Reveals a Deep, Clean-Cut Crevasse.
🎥: polar frontier.
#GlacierCollapse #IceCalving https://t.co/VT8xP3BmNj— মৃত্যুঞ্জয়/姆里蒂尤恩贾伊/Mrityunjay 🇮🇳 (@VloggerCalcutta) October 24, 2026
नीचे से खोखला कर रहा समुद्र का गर्म पानी
वैज्ञानिकों ने इस बार बर्फ की चादर का एक बेहद एडवांस 3D मॉडल तैयार किया है। इससे पता चला है कि समुद्र में आने वाले ज्वार-भाटा (Tides) के कारण अपेक्षाकृत गर्म समुद्री पानी ग्लेशियर के बिल्कुल नीचे (ग्राउंडिंग जोन) तक पहुंच रहा है। यह गर्म पानी ग्लेशियर के निचले हिस्से को अंदर ही अंदर तेजी से चाट रहा है।
ऊपर से ग्लेशियर भले ही ठीक दिखे, लेकिन नीचे से यह पूरी तरह खोखला हो रहा है। इसी वजह से यह ग्लेशियर समुद्र के नीचे मौजूद ‘मौजिनोट रिज’ (Mouginot Ridge) नाम की एक प्राकृतिक चट्टान से अलग हो रहा है, जो इसे अब तक रोक कर रखे हुए थी। वैज्ञानिकों के अनुसार इस सदी के अंत तक इसके पूरी तरह अलग होने की 60% संभावना है।
क्यों नाम पड़ा ‘प्रलय का ग्लेशियर’?
इसे ‘डूम्सडे’ यानी प्रलय का नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि यह केवल खुद नहीं पिघल रहा, बल्कि यह पश्चिमी अंटार्कटिका की पूरी बर्फ की चादर के लिए एक ‘सुरक्षा दीवार’ की तरह खड़ा है। अगर थ्वाइट्स ग्लेशियर पूरी तरह ढह जाता है, तो इसके पीछे मौजूद बर्फ की विशाल चट्टानें भी समुद्र में गिर जाएंगी।
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ऐसी स्थिति में दुनिया के बड़े-बड़े तटीय शहर (जैसे मुंबई, न्यूयॉर्क, मियामी, शंघाई) पूरी तरह बाढ़ की चपेट में आ जाएंगे और करोड़ों लोग बेघर हो जाएंगे। वैज्ञानिक अब वर्ष 2028 में इस ग्लेशियर के नीचे पानी की हलचल का सीधे तौर पर लाइव निरीक्षण करने की तैयारी कर रहे हैं, ताकि आने वाली इस महा-तबाही का सटीक समय और इसका तोड़ निकाला जा सके।

