पंजाबी नहीं, इस भाषा का है वायरल लोकगीत ‘छलरे-छलरे वाल’, सुनंदा शर्मा से भारत में बढ़ा क्रेज

Chhalre Chhalre Waal
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Chhalre Chhalre Waal Song: सोशल मीडिया पर इन दिनों ‘छलरे-छलरे वाल’ गाने की धुन लोगों को खूब पसंद आ रही है। कई लोग इसे पंजाबी लोकगीत समझ रहे हैं, लेकिन इसकी असली पहचान कुछ अलग है। पाकिस्तान की सराइकी लोकसंस्कृति से जुड़ा यह गीत अब भारतीय यूजर्स के बीच भी चर्चा का विषय बन गया है।

छलरे-छलरे वाल का मतलब क्या है?

‘छलरे-छलरे वाल’ सुनने में पंजाबी गीत जैसा लग सकता है, लेकिन यह सराइकी भाषा की पारंपरिक लोकधुन है। इसकी पंक्ति का संबंध घुंघराले, छल्लेदार या लहराते बालों से है। गीत में प्रेम और सुंदरता को लोकगीतों के सहज अंदाज में पेश किया गया है।

इस गीत की एक खास बात इसका नजरिया भी है। पारंपरिक प्रेम गीतों में अक्सर पुरुष अपनी प्रेमिका की सुंदरता का वर्णन करता है। वहीं, इस लोकगीत में एक प्रेमिका अपने प्रियतम के घुंघराले बालों, उसकी चाल और पहनावे की तारीफ करती है। यही अंदाज इसे दूसरे रोमांटिक गीतों से अलग बनाता है।

सराइकी भाषा की खास पहचान

सराइकी भाषा मुख्य रूप से पाकिस्तान के दक्षिणी पंजाब में बोली जाती है। मुल्तान, बहावलपुर, डेरा गाजी खान, मुजफ्फरगढ़ और रहीम यार खान इसके प्रमुख भाषाई केंद्रों में शामिल हैं। यहां के लोकगीतों में स्थानीय जीवन, प्रेम, सूफी परंपरा और क्षेत्रीय संस्कृति की झलक मिलती है।

सराइकी लोकसाहित्य की अपनी समृद्ध परंपरा है। ख्वाजा गुलाम फरीद जैसे सूफी कवियों की रचनाओं ने इस भाषा की साहित्यिक और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया है। इसी परंपरा से जुड़ी लोकधुनें पीढ़ियों से लोगों के बीच लोकप्रिय रही हैं।

हालांकि, सराइकी और पंजाबी में कई समानताएं हैं। दोनों भाषाओं की शब्दावली, उच्चारण और ऐतिहासिक संबंधों के कारण पहली बार सुनने वाले लोग अक्सर सराइकी गीत को पंजाबी समझ लेते हैं। इसके बावजूद सराइकी की अपनी अलग भाषाई पहचान और साहित्यिक विरासत है।

शांजी सिबल और सुनंदा शर्मा से बढ़ा क्रेज

‘छलरे-छलरे वाल’ को सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बनाने में पाकिस्तानी गायिका शांजी सिबल के एकॉस्टिक और अनप्लग्ड अंदाज का अहम योगदान बताया जाता है। उनके गाए संस्करण में सादगी भरी आवाज और गिटार की धुन सुनने को मिलती है, जो इस पारंपरिक गीत को नया संगीत अनुभव देती है।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, उनके वीडियो को कुछ ही हफ्तों में 50 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिले। हालांकि, व्यूज की संख्या समय के साथ बदल सकती है और अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर इसके आंकड़े अलग हो सकते हैं।

वहीं, भारतीय पंजाबी गायिका सुनंदा शर्मा के इस गीत को गुनगुनाने के बाद भारत में भी इसे लेकर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी। सोशल मीडिया यूजर्स अब इसकी धुन के साथ-साथ इसके बोल, भाषा और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बारे में भी जानना चाहते हैं।

इंस्टाग्राम रील्स जैसे प्लेटफॉर्म ने इस गीत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद की है। पहले क्षेत्रीय लोकगीत अक्सर अपने सीमित भौगोलिक दायरे में लोकप्रिय रहते थे, लेकिन अब छोटे वीडियो के जरिए वे दूसरे देशों के श्रोताओं तक भी पहुंच रहे हैं।

‘ना कजरे की धार’ से क्यों हो रही तुलना?

‘छलरे-छलरे वाल’ के वायरल होने के बाद कुछ श्रोताओं ने इसकी धुन की तुलना 1994 की फिल्म ‘मोहरा’ के लोकप्रिय गीत ‘ना कजरे की धार’ से की है। लोगों को दोनों गानों की लय और संगीत प्रवाह में समानता महसूस होती है।

हालांकि, केवल सुनने में समानता होने से यह साबित नहीं होता कि किसी गीत की नकल की गई है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर दोनों रचनाओं के बीच किसी आधिकारिक संबंध या नकल का दावा करने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। इसलिए इस तुलना को श्रोताओं की संगीत संबंधी राय के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

लोकसंगीत को मिल रहा नया मंच

‘छलरे-छलरे वाल’ की लोकप्रियता दिखाती है कि क्षेत्रीय भाषाओं का संगीत डिजिटल दौर में नए श्रोताओं तक पहुंच सकता है। किसी गीत को पसंद करने के लिए उसकी भाषा समझना हमेशा जरूरी नहीं होता। कई बार उसकी धुन, आवाज और भावनाएं ही लोगों को उससे जोड़ देती हैं।

सराइकी लोकगीत का भारत में लोकप्रिय होना इस बात का उदाहरण है कि संगीत सांस्कृतिक सीमाओं के पार भी लोगों को जोड़ सकता है। सोशल मीडिया की मदद से ऐसी पारंपरिक रचनाओं को नई पहचान मिल रही है और युवा पीढ़ी भी क्षेत्रीय लोकसंस्कृति के बारे में जानने के लिए उत्सुक हो रही है।

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Netsha

Founder & Editor, जय जगदम्बा न्यूज
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