क्या भारत पर लग सकता है 100% टैरिफ? अमेरिका के नए बिल से बढ़ी चिंता, जानिए पूरा मामला

अमेरिका में रूस से तेल खरीदने वाले देशों को लेकर एक नया बिल तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसके बाद भारत का नाम भी चर्चा में आ गया है। सवाल उठ रहा है कि क्या भविष्य में भारत पर 100% टैरिफ लगाया जा सकता है? अमेरिकी सीनेट की इस कार्रवाई ने वैश्विक व्यापार और भारत की ऊर्जा नीति को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। आखिर यह बिल क्या है, भारत पर इसका कितना असर पड़ सकता है और आगे क्या हो सकता है, आइए आसान भाषा में पूरा मामला समझते हैं।
अमेरिका का नया रूस प्रतिबंध बिल क्या है?
अमेरिकी सीनेट ने रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर सख्त कदम उठाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया पूरी कर ली है। यह प्रस्तावित कानून अमेरिका के राष्ट्रपति को यह अधिकार देगा कि वे रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले बड़े देशों के आयात पर अधिकतम 100% तक टैरिफ लगा सकें।
हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि बिल पारित होते ही सभी देशों पर 100% टैरिफ अपने आप लागू नहीं होगा। इस कानून के तहत अंतिम फैसला अमेरिका के राष्ट्रपति के हाथ में होगा। वे यह तय करेंगे कि किन देशों पर कार्रवाई करनी है, कितना टैरिफ लगाना है और किन मामलों में छूट दी जा सकती है।
यह बिल कानून बनने से पहले किन चरणों से गुजरेगा?
28 जुलाई को अमेरिकी सीनेट ने इस बिल को आगे बढ़ाने के लिए 86 के मुकाबले 12 वोटों से मंजूरी दी। अब इसे सीनेट से अंतिम स्वीकृति मिलने के बाद प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) से भी पारित होना होगा। इसके बाद राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने पर ही यह कानून बन सकेगा।
कानून लागू होने से पहले अमेरिका का व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) हर 180 दिन में रूस से ऊर्जा खरीदने वाले पांच सबसे बड़े आयातक देशों की समीक्षा करेगा। मौजूदा स्थिति के अनुसार इस सूची में चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान जैसे देशों के शामिल होने की संभावना है। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति तय करेंगे कि किन देशों पर टैरिफ लगाया जाए और किन्हें छूट दी जाए।
भारत के लिए यह मामला क्यों अहम माना जा रहा है?
पिछले कुछ समय में भारत ने रूस से कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई है। जून में भारत का रूसी कच्चे तेल का आयात लगभग 26 लाख बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। जुलाई में भी आयात इसी स्तर के आसपास रहने का अनुमान है।
मध्य पूर्व में तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तेल आपूर्ति प्रभावित होने के कारण भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से अधिक तेल खरीदना जारी रखा। रियायती दरों पर मिलने वाले रूसी तेल ने भारत के आयात खर्च को कम रखने, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और महंगाई को नियंत्रित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 30.3% हिस्सा रूस से आया। इस दौरान रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा। इसलिए यदि भविष्य में अमेरिका कोई सख्त व्यापारिक कदम उठाता है तो उसका असर भारत के ऊर्जा और व्यापार क्षेत्र पर पड़ सकता है।
क्या भारत पर लागू होने वाला है 100% टैरिफ?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगा। यह बिल अभी कानून नहीं बना है और यदि भविष्य में यह कानून बन भी जाता है, तब भी भारत पर 100% टैरिफ (India 100 Percent Tariff) अपने आप लागू नहीं होगा। प्रस्तावित कानून केवल अमेरिका के राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वे परिस्थितियों के अनुसार तय करें कि किस देश पर टैरिफ लगाया जाए, कितना लगाया जाए और किन मामलों में छूट दी जाए।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि,
चीन रूस से सबसे अधिक तेल खरीदता है, लेकिन पहले भी अमेरिका भारत पर व्यापारिक कार्रवाई कर चुका है जबकि चीन को कुछ मामलों में छूट मिली थी। ऐसे में यदि राष्ट्रपति अपने विवेक से फैसला लेते हैं, तो भारत पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
अमेरिका की चेतावनी पर भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपनी ऊर्जा नीति केवल बाहरी दबाव के आधार पर नहीं बदलनी चाहिए। देश के लिए ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक हित और रणनीतिक स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण हैं। यदि रूस से मिलने वाला कच्चा तेल आर्थिक रूप से फायदेमंद बना रहता है, तो भारत अपनी जरूरतों के अनुसार इसकी खरीद जारी रख सकता है।
साथ ही, अमेरिका के साथ किसी भी मतभेद को बातचीत और कूटनीतिक तरीके से सुलझाने की कोशिश की जा सकती है। कुल मिलाकर, इस प्रस्तावित अमेरिकी बिल ने भारत समेत कई देशों की चिंता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन फिलहाल भारत पर 100% टैरिफ लागू होने जैसी कोई स्थिति नहीं बनी है। अब सबकी नजर बिल की आगे की कानूनी प्रक्रिया और अमेरिकी प्रशासन के अंतिम फैसले पर रहेगी।
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