क्या दुनिया में आने वाली है खाने की भारी कमी? भारत पर कितना होगा असर, जानिए पूरी सच्चाई

S. Jaishankar Food Crisis Warning: सोशल मीडिया पर विदेश मंत्री एस जयशंकर का एक वीडियो तेजी से चर्चा में है। वीडियो को इस दावे के साथ शेयर किया जा रहा है कि दुनिया में जल्द ही खाने की भारी कमी होने वाली है और लोगों को अभी से घर में राशन जमा कर लेना चाहिए। लेकिन क्या एस जयशंकर ने वास्तव में दुनिया में खाद्य संकट आने की कोई निश्चित तारीख या भविष्यवाणी की है? आइए समझते हैं कि उन्होंने क्या कहा और भारत के लिए इसका क्या मतलब हो सकता है।
एस जयशंकर ने Food Crisis को लेकर क्या कहा?
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में दुनिया के बदलते हालात पर चर्चा की थी। इसी दौरान उन्होंने भविष्य में कई तरह के वैश्विक संकटों की आशंका जताई। इसमें खाद्य पदार्थ, ईंधन, उर्वरक और वित्त जैसे संकट शामिल हैं।
जयशंकर ने बताया कि यूक्रेन, ईरान और खाड़ी क्षेत्र में चल रहे संघर्षों का असर केवल उन्हीं देशों तक सीमित नहीं रहता। इन घटनाओं का प्रभाव दुनिया के दूसरे हिस्सों पर भी पड़ता है। युद्ध और तनाव की वजह से अनाज की सप्लाई, फर्टिलाइजर और ऊर्जा की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
EAM Jaishankar warns of “major food crisis in coming months” amid shortages of grains, fertilizers, super El Niño
Vdo source: Asia Society https://t.co/Ti9rdvqV2h
— Sidhant Sibal (@sidhant) September 29, 2026
यही बात सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो का आधार बन गई। हालांकि, वायरल पोस्ट में उनकी बात को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे उन्होंने आने वाले महीनों में निश्चित तौर पर खाने की भारी कमी होने की घोषणा कर दी हो।
ऐसा नहीं है। उन्होंने किसी निश्चित तारीख या समय सीमा में दुनिया में खाद्य संकट आने की घोषणा नहीं की थी। उनकी बात संभावित वैश्विक जोखिमों और बदलते हालात को लेकर चेतावनी के तौर पर थी।
क्यों बढ़ सकता है दुनिया में खाद्य संकट का खतरा?
दुनिया का खाद्य बाजार कई देशों की सप्लाई चेन पर निर्भर करता है। ऐसे में किसी बड़े युद्ध या अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर दूसरे देशों पर भी पड़ सकता है। रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध की वजह से ब्लैक सी क्षेत्र से होने वाली अनाज की आवाजाही प्रभावित हुई है। अगर अनाज की शिपमेंट में लंबे समय तक परेशानी रहती है तो कई देशों में सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके अलावा खेती के लिए यूरिया, DAP और दूसरे फर्टिलाइजर जरूरी होते हैं। युद्ध और अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण इनकी सप्लाई प्रभावित होने पर कीमत बढ़ सकती है। इससे किसानों की लागत बढ़ेगी और इसका असर आगे चलकर खाद्य पदार्थों की कीमत पर भी दिखाई दे सकता है।
ऊर्जा की कीमतें भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। तेल और गैस महंगे होने पर खेती से लेकर खाद्य पदार्थों के परिवहन तक की लागत बढ़ जाती है। इसका सीधा असर पूरी Food Supply Chain पर पड़ सकता है।
मौसम भी एक बड़ा जोखिम है। El Nino की स्थिति में बारिश और तापमान के सामान्य पैटर्न में बदलाव हो सकता है। कहीं सूखे की स्थिति बन सकती है तो कहीं जरूरत से ज्यादा बारिश फसलों को नुकसान पहुंचा सकती है। अगर ऐसे हालात लंबे समय तक बने रहते हैं तो खाद्य उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत में क्या खाने की कमी होने वाली है?
वायरल वीडियो देखने के बाद कई लोगों के मन में यह सवाल है कि क्या भारत में भी राशन और अनाज की कमी हो सकती है। फिलहाल ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है कि देश में अचानक खाद्य सामग्री खत्म होने वाली है।
भारत के पास बड़े खाद्यान्न भंडार मौजूद हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सप्लाई में किसी तरह का झटका आने पर भी देश के पास कुछ समय तक स्थिति संभालने की क्षमता है। इसका मतलब यह भी नहीं है कि वैश्विक संकट का भारत पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
अगर युद्ध की वजह से फर्टिलाइजर, तेल और परिवहन की लागत बढ़ती है या खराब मौसम से फसल प्रभावित होती है तो अनाज और दूसरी खाद्य वस्तुओं की कीमत बढ़ सकती है। इसका असर आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है। कम आय वाले परिवारों पर इसका प्रभाव ज्यादा महसूस हो सकता है।
क्या लोगों को घर में राशन जमा करने की जरूरत है?
सोशल मीडिया पर लोगों को घर में बड़ी मात्रा में राशन जमा करने की सलाह देने वाले दावों को सावधानी से देखना चाहिए। एस जयशंकर की बात को तत्काल खाद्य संकट की घोषणा या घर में राशन जमा करने की सलाह के रूप में नहीं समझना चाहिए।
कुल मिलाकर, खाद्य संकट की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि युद्ध, फर्टिलाइजर, ऊर्जा, अनाज की सप्लाई और मौसम जैसे कई कारक वैश्विक खाद्य व्यवस्था को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन वायरल वीडियो में जिस तरह इसे तत्काल आने वाले बड़े संकट के रूप में पेश किया जा रहा है, वह जयशंकर की मूल बात से अलग है। उनकी टिप्पणी मुख्य रूप से बदलती वैश्विक परिस्थितियों से पैदा होने वाले संभावित जोखिमों को लेकर सतर्क रहने की बात थी।

