380 ग्राम की इस भारतीय बैटरी ने अंतरिक्ष में कर दिखाया बड़ा कारनामा, दुनिया भी हैरान

India First Space PowerBank-50 Successfully Tested Vikram 1 Mission
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India First Space PowerBank: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ी सफलता सामने आई है। बेंगलुरु की स्पेस स्टार्टअप TakeMe2Space ने दावा किया है कि उसका स्वदेशी सैटेलाइट बैटरी सिस्टम अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक काम कर चुका है। इस उपलब्धि से भारतीय सैटेलाइट कंपनियों को अब महंगे विदेशी बैटरी सिस्टम पर कम निर्भर रहना पड़ सकता है।

अंतरिक्ष में कैसे सफल हुआ भारत का पहला Space PowerBank?

भारत की स्पेस स्टार्टअप TakeMe2Space ने अपने PowerBank-50 के जरिए अंतरिक्ष में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। कंपनी के अनुसार, यह भारत का पहला स्वदेश में विकसित सैटेलाइट बैटरी सिस्टम है, जिसने अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक काम करके अपनी विश्वसनीयता साबित की है।

PowerBank-50 को Skyroot Aerospace के Vikram-1 ‘Aagaman’ मिशन के तहत भेजा गया था। इसे Cosmoserve Space के पेलोड के साथ Orbital Experimentation Module (OAM) में लगाया गया। मिशन के दौरान यह बैटरी पृथ्वी से लगभग 450 किलोमीटर की लो-अर्थ ऑर्बिट में लगातार काम करती रही और पेलोड को आवश्यक बिजली उपलब्ध कराती रही।

कंपनी का कहना है कि,

इस सफल परीक्षण के बाद PowerBank-50 आधिकारिक रूप से ‘स्पेस-प्रूवन’ बन गया है।

यानी अब यह साबित हो चुका है कि यह बैटरी अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में भी प्रभावी ढंग से काम कर सकती है। यह उपलब्धि भारत के पहले निजी ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल Vikram-1 मिशन की महत्वपूर्ण सफलताओं में भी शामिल है।

PowerBank-50 क्या है?

PowerBank-50 एक छोटा लेकिन बेहद शक्तिशाली सैटेलाइट बैटरी पैक है, जिसे खास तौर पर अंतरिक्ष मिशनों के लिए विकसित किया गया है। इसका वजन सिर्फ 380 ग्राम है, जो लगभग एक स्मार्टफोन के बराबर है। आकार में यह एक छोटी किताब जितना है, लेकिन इसके बावजूद यह 50 वॉट-घंटे से अधिक ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता रखता है।

इस बैटरी में उच्च ऊर्जा घनत्व (High Energy Density) वाली सेल का इस्तेमाल किया गया है। साथ ही इसमें स्मार्ट बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम (BMS) दिया गया है, जो बैटरी की कार्यक्षमता पर लगातार नजर रखता है, सेल को संतुलित बनाए रखता है और उसकी स्थिति से जुड़ी जानकारी धरती पर मौजूद ऑपरेटरों तक पहुंचाता है।

अंतरिक्ष के बेहद ठंडे वातावरण में भी यह बैटरी सुचारु रूप से काम कर सके, इसके लिए इसमें बिल्ट-इन थर्मल मैनेजमेंट सिस्टम भी शामिल किया गया है। कंपनी के मुताबिक, कई PowerBank-50 यूनिट को एक साथ जोड़कर CubeSat और माइक्रो सैटेलाइट जैसे छोटे उपग्रहों को बिजली दी जा सकती है। लो-अर्थ ऑर्बिट में इसकी अनुमानित कार्य अवधि लगभग पांच वर्ष तक बताई गई है।

भारत के सैटेलाइट उद्योग को क्या होगा फायदा?

अब तक भारत में छोटे सैटेलाइट बनाने वाली कई कंपनियां विदेशी स्पेस-ग्रेड बैटरियों पर निर्भर रहती थीं। इन बैटरियों की कीमत अधिक होती थी और इन्हें मंगाने में भी काफी समय लगता था।

TakeMe2Space का कहना है कि,

उसका PowerBank-50 भारतीय कंपनियों के लिए तैयार उपलब्ध है और इसकी कीमत 1,04,900 रुपये रखी गई है।

कंपनी का दावा है कि यह कई अंतरराष्ट्रीय विकल्पों की तुलना में अधिक किफायती है। इस सफलता से भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। इससे देश में सैटेलाइट निर्माण की लागत कम हो सकती है और स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा।

TakeMe2Space का अगला लक्ष्य क्या है?

TakeMe2Space केवल बैटरी बनाने तक सीमित नहीं है। कंपनी भविष्य में अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग प्लेटफॉर्म और ऑर्बिटल डेटा सेंटर विकसित करने पर भी काम कर रही है। कंपनी का उद्देश्य अंतरिक्ष में ही डेटा की प्रोसेसिंग और विश्लेषण करना है, ताकि बड़ी मात्रा में जानकारी को बार-बार पृथ्वी पर भेजने की जरूरत कम हो सके।

यदि यह तकनीक सफल होती है, तो भविष्य में अंतरिक्ष मिशनों की कार्यक्षमता बढ़ सकती है और डेटा प्रोसेसिंग पहले से अधिक तेज और प्रभावी हो सकती है।

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