अमेरिका से इंजन की देरी के बीच भारत का बड़ा दांव, Tejas Mk1A को मिल सकती है Kaveri 2.0 की ‘देशी’ ताकत

अमेरिका से GE F404 इंजन की सप्लाई में देरी ने Tejas Mk1A कार्यक्रम के सामने चुनौती बढ़ाई है। इसी बीच भारत अपने स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन प्रोग्राम को आगे बढ़ाने की कोशिश में है। DRDO की GTRE (Gas Turbine Research Establishment) ने Kaveri इंजन के नए और ज्यादा शक्तिशाली संस्करण Kaveri 2.0 पर काम किया है, जिसका लक्ष्य करीब 90 से 100kN तक अधिकतम थ्रस्ट हासिल करना है।
अगर इसका विकास, परीक्षण और प्रमाणन सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में Kaveri 2.0 भारत के लिए विदेशी लड़ाकू विमान इंजनों पर निर्भरता कम करने का विकल्प बन सकता है।
Kaveri 2.0 में पुराने इंजन से कितना बदलाव हुआ है?
भारत का Kaveri इंजन लंबे समय से स्वदेशी लड़ाकू विमान इंजन विकसित करने की कोशिश का हिस्सा रहा है। पुराने Kaveri इंजन की क्षमता करीब 49kN से 52kN थ्रस्ट तक थी। यह Tejas की जरूरत के मुकाबले कम थी, इसलिए इसे विमान के मुख्य इंजन के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सका।
अब GTRE ने Kaveri के नए संस्करण पर काम करते हुए इसके डिजाइन में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। Kaveri 2.0 का लक्ष्य बिना आफ्टरबर्नर के करीब 55 से 60kN ड्राई थ्रस्ट और आफ्टरबर्नर के साथ लगभग 90 से 100kN तक अधिकतम थ्रस्ट हासिल करना है।
यही लक्ष्य इसे Tejas Mk1A की जरूरतों के ज्यादा करीब लाता है। हालांकि, अभी इसे सीधे Tejas Mk1A में लगाने की स्थिति नहीं है। इंजन को पहले जरूरी विकास, परीक्षण और प्रमाणन प्रक्रिया से गुजरना होगा। Kaveri 2.0 के नए डिजाइन में हाई-प्रेशर कंप्रेसर को भी दोबारा विकसित किया गया है। इसका उद्देश्य इंजन का प्रेशर रेशियो और ईंधन दक्षता बेहतर करना है।
इसके अलावा इंजन में टाइटेनियम एलॉय से बना एडवांस ब्लिस्क इस्तेमाल किया गया है। इसमें ब्लेड और डिस्क को एक ही हिस्से में जोड़ा जाता है। इससे इंजन का वजन कम करने और थ्रस्ट-टू-वेट रेशियो बेहतर करने में मदद मिल सकती है।
इंजन में सिंगल-क्रिस्टल टर्बाइन ब्लेड भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ये ब्लेड बहुत अधिक तापमान सहने के लिए डिजाइन किए जाते हैं। इससे इंजन की थर्मल एफिशिएंसी और प्रदर्शन को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
क्या GE F404 की जगह ले सकता है Kaveri 2.0?
Tejas Mk1A फिलहाल GE F404 इंजन पर निर्भर है। इन अमेरिकी इंजनों की सप्लाई में देरी से विमान के उत्पादन कार्यक्रम पर असर पड़ा है। ऐसे में भारत के लिए एक स्वदेशी इंजन विकसित करना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। कावेरी 2.0 का करीब 90 से 100kN अधिकतम थ्रस्ट का लक्ष्य इस लिहाज से महत्वपूर्ण है।
| पहलू | GE F404 | Kaveri 2.0 |
|---|---|---|
| इंजन का स्रोत | अमेरिका | भारत |
| निर्माता/विकास संस्था | General Electric | DRDO की GTRE |
| Tejas Mk1A में स्थिति | वर्तमान में इस्तेमाल | संभावित भविष्य का विकल्प |
| अधिकतम थ्रस्ट | करीब 85kN श्रेणी | करीब 90-100kN लक्ष्य |
| आफ्टरबर्नर | हां | हां |
| स्वदेशीकरण | विदेशी इंजन | स्वदेशी विकास |
| वर्तमान स्थिति | Tejas Mk1A का मौजूदा इंजन | विकास, परीक्षण और प्रमाणन की जरूरत |
अगर इंजन अपने निर्धारित प्रदर्शन तक पहुंचता है और सभी जरूरी परीक्षणों को सफलतापूर्वक पूरा करता है, तो भविष्य में यह विदेशी इंजन पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकता है। लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। Kaveri 2.0 को अभी GE F404 का तैयार विकल्प नहीं माना जा सकता।
किसी लड़ाकू विमान में नया इंजन लगाने से पहले सिर्फ थ्रस्ट पर्याप्त नहीं होता। इंजन की विश्वसनीयता, सुरक्षा, endurance, प्रदर्शन और विमान के साथ integration भी साबित करना पड़ता है। इसके बावजूद भविष्य के लिए इसका महत्व काफी बड़ा हो सकता है।
दशक के अंत तक कुछ Tejas विमानों के इंजन अपने mid-life replacement cycle के करीब पहुंच सकते हैं। उस समय तक अगर कावेरी 2.0 जरूरी परीक्षण और प्रमाणन पूरा कर लेता है, तो इसे संभावित भारतीय विकल्प के रूप में देखा जा सकता है। इससे भारत को इंजन की सप्लाई, रखरखाव और भविष्य के अपग्रेड पर ज्यादा नियंत्रण मिल सकता है।
Ghatak ड्रोन से Kaveri प्रोग्राम को मिल रहा अहम अनुभव
Kaveri प्रोग्राम की कहानी सिर्फ Tejas तक सीमित नहीं है। इसके ड्राई यानी बिना आफ्टरबर्नर वाले संस्करण का इस्तेमाल DRDO के Ghatak stealth combat unmanned aerial vehicle यानी UCAV को शक्ति देने के लिए किया जा रहा है।
Ghatak जैसे स्वदेशी स्टील्थ ड्रोन पर Kaveri के इस्तेमाल से भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को वास्तविक सैन्य प्लेटफॉर्म के लिए इंजन तकनीक पर काम करने का अनुभव मिल रहा है। यही अनुभव आगे ज्यादा शक्तिशाली Kaveri 2.0 के विकास में उपयोगी हो सकता है।
भारत के लिए स्वदेशी फाइटर इंजन विकसित करना आसान काम नहीं रहा है। Kaveri कार्यक्रम को कई तकनीकी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। अब Kaveri 2.0 के जरिए नए डिजाइन, बेहतर सामग्री और पहले के अनुभव को मिलाकर एक ज्यादा सक्षम इंजन विकसित करने की कोशिश की जा रही है।
Kaveri 2.0 से भारत को क्या उम्मीद है?
अगर Kaveri 2.0 अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, तो इसका फायदा केवल तेजस Mk1A तक सीमित नहीं रहेगा। इससे भारत को भविष्य के लड़ाकू विमानों के लिए एक स्वदेशी इंजन तकनीक विकसित करने में मदद मिल सकती है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या Kaveri 2.0 परीक्षण और प्रमाणन के दौरान अपने 90 से 100kN थ्रस्ट के लक्ष्य को हासिल कर पाएगा। अगर ऐसा होता है, तो यह भारत के स्वदेशी फाइटर इंजन कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हो सकती है।
अभी Kaveri 2.0 को operational fighter engine बनने से पहले लंबा रास्ता तय करना है। लेकिन GE F404 की सप्लाई में देरी के बीच इसका विकास भारत के लिए एक ऐसे समय में हो रहा है, जब स्वदेशी इंजन क्षमता की जरूरत पहले से ज्यादा महसूस की जा रही है।




