श्रीराम नहीं थे साथ, फिर माता सीता ने कैसे किया राजा दशरथ का पिंडदान? जानें गया की पौराणिक कथा

Raja Dashrath Pind Daan
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Raja Dashrath Pind Daan: बिहार के गयाजी को पितरों के श्राद्ध और पिंडदान के लिए बेहद महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण यहां राजा दशरथ का श्राद्ध करने पहुंचे थे। इसी दौरान एक ऐसी घटना हुई, जिसमें माता सीता ने श्रीराम की गैरमौजूदगी में अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान किया।

इस कथा में फल्गु नदी, गाय, केतकी का फूल, एक ब्राह्मण और अक्षयवट को साक्षी बताया गया है। मान्यता के अनुसार, इनमें से चार ने सत्य का साथ नहीं दिया, जबकि अक्षयवट ने माता सीता के पिंडदान की सच्चाई स्वीकार की।

वनवास के दौरान मिली राजा दशरथ के निधन की खबर

पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास में थे। इसी दौरान उन्हें राजा दशरथ के निधन की सूचना मिली। पिता के निधन की खबर से श्रीराम बेहद दुखी हुए। इसके बाद उन्होंने पितृ कर्तव्य निभाने के लिए गया जाने का निर्णय लिया।

तीनों गयाजी पहुंचे और फल्गु नदी के किनारे राजा दशरथ के पिंडदान की तैयारी शुरू की। गया को पितरों के श्राद्ध और मुक्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है। इसी वजह से यहां पिंडदान करने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है।

पिंडदान के लिए आवश्यक सामग्री लेने भगवान श्रीराम और लक्ष्मण वहां से चले गए। इसी बीच पिंडदान का समय निकलता जा रहा था। कथा के अनुसार तभी राजा दशरथ की आत्मा माता सीता के सामने प्रकट हुई और उन्होंने पिंडदान करने की इच्छा जताई।

माता सीता ने कैसे किया राजा दशरथ का पिंडदान?

माता सीता ने राजा दशरथ की आत्मा से कहा कि श्रीराम की अनुपस्थिति में उनके लिए पिंडदान करना उचित कैसे होगा। इस पर राजा दशरथ ने उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके हाथों से किया गया पिंडदान भी स्वीकार होगा।

समय बीतता देख माता सीता ने फल्गु नदी के किनारे मौजूद बालू से पिंड तैयार किए। इसके बाद उन्होंने विधि-विधान के अनुसार राजा दशरथ का पिंडदान किया। धार्मिक मान्यता के अनुसार राजा दशरथ ने माता सीता द्वारा किए गए पिंडदान को स्वीकार किया और उन्हें आशीर्वाद दिया।

इसके बाद जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण आवश्यक सामग्री लेकर वापस लौटे तो माता सीता ने उन्हें पूरी घटना बताई। श्रीराम को इस बात पर आश्चर्य हुआ और उन्होंने पिंडदान के प्रमाण के बारे में पूछा।

माता सीता ने बताया कि इस घटना के समय वहां मौजूद कुछ लोगों और वस्तुओं ने पूरी घटना देखी थी। उन्होंने फल्गु नदी, गाय, केतकी का फूल, ब्राह्मण और अक्षयवट को साक्षी बनाया था।

चार साक्षियों ने नहीं बताया सच, अक्षयवट को मिला वरदान

कथा के अनुसार, जब श्रीराम ने साक्षियों से घटना की पुष्टि करने को कहा तो अक्षयवट को छोड़कर बाकी चार साक्षियों ने माता सीता द्वारा किए गए पिंडदान की पुष्टि नहीं की। केवल अक्षयवट ने सच का साथ दिया और बताया कि माता सीता ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था।

साक्षियों के इस व्यवहार से माता सीता नाराज हो गईं। मान्यता के अनुसार उन्होंने फल्गु नदी को श्राप दिया कि उसका पानी धरती के ऊपर दिखाई नहीं देगा और नदी ऊपर से सूखी नजर आएगी। कहा जाता है कि इसी कारण फल्गु नदी का जल कई जगह जमीन के नीचे बहता है।

गाय को श्राप दिया गया कि उसका मुख अपवित्र माना जाएगा। ब्राह्मण को यह श्राप मिला कि गया में उन्हें कितना भी धन मिले, फिर भी धन पाने की इच्छा बनी रहेगी। वहीं केतकी के फूल को पूजा में स्वीकार न किए जाने का श्राप मिला।

लेकिन अक्षयवट के सच बोलने से माता सीता प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसे हमेशा अक्षय रहने का वरदान दिया। इसी वजह से पौराणिक मान्यता में गया के पिंडदान और श्राद्ध कर्म में अक्षयवट का विशेष महत्व बताया जाता है।

पितृपक्ष के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु गयाजी पहुंचते हैं और पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। अक्षयवट को साक्षी मानकर किए जाने वाले इन धार्मिक कर्मों की परंपरा आज भी इस कथा से जुड़ी हुई है। माता सीता द्वारा राजा दशरथ के पिंडदान की यह कथा गयाजी को पितृ तीर्थ के रूप में मिलने वाली धार्मिक मान्यता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

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Adarsh Pandey

Founder & Editor, जय जगदम्बा न्यूज
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