₹70,000 करोड़ की 6 पनडुब्बियों पर बड़ा फैसला जल्द? भारत की समुद्री ताकत बदल देगा Project 75(I)

Project 75I: India-Germany Rs 70,000 crore submarine deal nears key approval
1 min read

भारत की लंबे समय से अटकी छह अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों की योजना अब आगे बढ़ती दिख रही है। करीब 70,000 करोड़ रुपये की Project 75(I) योजना जल्द ही अंतिम मंजूरी के लिए कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी यानी CCS के सामने आ सकती है। मंजूरी मिलती है तो भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ने के साथ देश में पनडुब्बी निर्माण और तकनीक के क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

CCS की मंजूरी के बाद आगे बढ़ेगा Project 75(I)

Project 75(I) पिछले कई वर्षों से तकनीकी जरूरतों, व्यावसायिक बातचीत और तकनीक ट्रांसफर से जुड़े मुद्दों के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहा था। अब इस योजना को जल्द CCS के सामने लाए जाने की संभावना है। NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्ताव आने वाले दिनों में सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति के सामने पहुंच सकता है।

अगर CCS से मंजूरी मिलती है, तो सरकारी कंपनी MDL (Mazagon Dock Shipbuilders Limited) और जर्मनी की TMKS (ThyssenKrupp Marine Systems) के बीच अनुबंध का रास्ता साफ हो सकता है। इस परियोजना के तहत भारत में छह नई पारंपरिक पनडुब्बियां बनाई जानी हैं।

यह सिर्फ छह पनडुब्बियां खरीदने की योजना नहीं है। भारत के लिए इसका बड़ा उद्देश्य देश में पनडुब्बी बनाने की क्षमता, रखरखाव, अपग्रेड और भविष्य में डिजाइन से जुड़ी तकनीकी विशेषज्ञता को मजबूत करना भी है।

ये भी पढ़ें: टाटा को मिला ₹1,577 करोड़ का बड़ा ऑर्डर, सेना को मिलेंगे 840 खतरनाक अटैक ड्रोन

Project 75(I) की पनडुब्बियां क्यों खास हैं?

Project 75(I) के तहत बनने वाली पनडुब्बियों में AIP (Air-Independent Propulsion) तकनीक होने की उम्मीद है। इस तकनीक की मदद से पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियां सामान्य व्यवस्था की तुलना में ज्यादा समय तक पानी के अंदर रह सकती हैं। उन्हें बार-बार सतह पर आने या स्नॉर्कलिंग करने की जरूरत कम होती है।

इन पनडुब्बियों में आधुनिक सेंसर, टॉरपीडो, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम जैसी क्षमताएं भी शामिल होने की उम्मीद है। इससे नौसेना को समुद्र में निगरानी, छिपकर गश्त करने और दुश्मन के समुद्री रास्तों पर दबाव बनाने में मदद मिल सकती है।

भारत पहले ही Project 75 के तहत छह Kalvari-class पनडुब्बियां MDL में फ्रांस की मदद से बना चुका है। इस सीरीज की छठी और आखिरी पनडुब्बी INS Vagsheer को जनवरी 2025 में नौसेना में शामिल किया गया था। ऐसे में Project 75I को भारतीय नौसेना की पारंपरिक पनडुब्बी क्षमता को आगे बढ़ाने वाली अगली बड़ी कड़ी माना जा रहा है।

TKMS का भारत में बढ़ रहा नेटवर्क

Project 75(I) में जर्मनी की TKMS की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी भारत में अपने औद्योगिक सहयोग का दायरा बढ़ा रही है। TKMS ने हैदराबाद की VEM Technologies के साथ भारी टॉरपीडो के विकास, उत्पादन, एकीकरण और भविष्य में आधुनिकीकरण को लेकर समझौता किया है।

इस साझेदारी में TKMS की सहायक कंपनी ATLAS ELEKTRONIK भी शामिल है। भारत में टॉरपीडो के इंटीग्रेशन और टेस्टिंग की जिम्मेदारी VEM Technologies निभाने की उम्मीद है। यह सहयोग आगे चलकर तकनीक ट्रांसफर और Make in India आधारित टॉरपीडो कार्यक्रम की दिशा में भी बढ़ा है।

TKMS ने मुंबई की CFF Fluid Control के साथ एंटी-सबमरीन वॉरफेयर सिस्टम को लेकर भी साझेदारी की है। कंपनी भारत की अन्य कंपनियों और संस्थानों, जिनमें DRDO भी शामिल है, के साथ सहयोग की संभावनाएं तलाश रही है।

भारत के लिए यही तकनीकी सहयोग Project 75(I) का सबसे बड़ा फायदा हो सकता है। MDL का जर्मन तकनीक के साथ पुराना अनुभव भी है। भारत ने पहले Type 209/1500 Shishumar-class पनडुब्बियों के निर्माण में जर्मन डिजाइन का इस्तेमाल किया था और इनमें से कई पनडुब्बियां MDL में 1980 के दशक से बनाई गई थीं।

ये भी पढ़ें: अमेरिका से इंजन की देरी के बीच भारत का बड़ा दांव, Tejas Mk1A को मिल सकती है Kaveri 2.0 की ‘देशी’ ताकत

भारत को क्यों चाहिए नई पनडुब्बियां?

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के बीच भारत के लिए समुद्र के अंदर निगरानी और सुरक्षा क्षमता मजबूत करना जरूरी हो गया है। Project 75(I) के तहत मिलने वाली नई पनडुब्बियां भारतीय नौसेना को समुद्री रास्तों और आसपास की नौसैनिक गतिविधियों पर नजर रखने में मदद कर सकती हैं।

लेकिन इस परियोजना का महत्व सिर्फ छह नई पनडुब्बियां हासिल करने तक सीमित नहीं है। भारत के लिए सबसे बड़ा फायदा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और घरेलू निर्माण क्षमता हो सकता है। यह देखना अहम होगा कि भारतीय कंपनियां इस प्रोजेक्ट के जरिए भविष्य में सिर्फ विदेशी सिस्टम की असेंबली करेंगी या उनके विकास, रखरखाव और अपग्रेड की क्षमता भी हासिल कर पाएंगी।

CCS की मंजूरी मिलने के बाद अनुबंध और अंतिम समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इसके बाद यह ज्यादा स्पष्ट होगा कि Project 75(I) में भारत में कितना काम होगा, तकनीक ट्रांसफर किस स्तर तक होगा और यह परियोजना देश की भविष्य की पनडुब्बी निर्माण क्षमता को कितना मजबूत करेगी।

Jai Jagdamba News Whatsapp

About the Author

Veer Rai

Founder & Editor, जय जगदम्बा न्यूज

Veer Rai जय जगदम्बा न्यूज के Founder और Editor हैं। उन्हें पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया क्षेत्र में कई वर्षों का अनुभव है। वे बिहार और देश-दुनिया से जुड़ी महत्वपूर्ण खबरों के साथ करियर, शिक्षा, नौकरी, राजनीति, धर्म, बिजनेस, टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल जैसे विषयों पर गहन और शोध-आधारित लेख प्रकाशित करते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों तक सरल, स्पष्ट और विश्वसनीय भाषा में उपयोगी, तथ्यपरक और प्रमाणित जानकारी पहुंचाना है, जिससे लोग सही और जागरूक निर्णय ले सकें।

View all articles by Veer Rai →