स्काईरूट की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स पर हो रही पैसों की बारिश, अब तक 871 मिलियन डॉलर की मिली फंडिंग

Indian Space Startups Funding After Skyroot Success
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Indian Space Startups Funding: भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए एक बड़ी सफलता अब निवेश में भी दिखाई देने लगी है। स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट की ऐतिहासिक उड़ान के बाद भारतीय स्पेस स्टार्टअप्स में निवेश तेजी से बढ़ा है। अब तक इस सेक्टर की 285 कंपनियां कुल 871 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटा चुकी हैं, जिससे साफ है कि दुनिया भारत की स्पेस टेक्नोलॉजी पर पहले से ज्यादा भरोसा जता रही है।

स्काईरूट की ऐतिहासिक उड़ान ने बदल दिया पूरा खेल

18 जुलाई को श्रीहरिकोटा से सात मंजिला विक्रम-1 रॉकेट ने सफल उड़ान भरते हुए 450 किलोमीटर की कक्षा में चार पेलोड स्थापित किए। यह भारत का पहला निजी तौर पर विकसित रॉकेट था जिसने सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचकर इतिहास रच दिया।

यह उपलब्धि सिर्फ एक सफल लॉन्च नहीं थी। इसने दुनिया को दिखाया कि भारतीय निजी स्पेस कंपनियां अब केवल योजनाएं नहीं बना रहीं, बल्कि जटिल अंतरिक्ष तकनीक विकसित कर वैश्विक स्तर पर अपनी क्षमता भी साबित कर रही हैं। इसी उपलब्धि के बाद निवेशकों का भरोसा और मजबूत हुआ।

ट्रैक्सन (Tracxn) के अनुसार, भारत के 285 स्पेस स्टार्टअप्स अब तक 871 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटा चुके हैं। इनमें स्काईरूट एयरोस्पेस करीब 150 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ सबसे आगे है। इसके बाद पिक्सेल, अग्निकुल और दिगंतारा जैसी कंपनियां भी प्रमुख निवेश पाने वाली स्टार्टअप्स में शामिल हैं।

सरकार की नीति और कम लागत बनी सबसे बड़ी ताकत

प्लेबुक पार्टनर्स के फाउंडिंग पार्टनर विकास चौधरी के अनुसार, पहले स्पेस स्टार्टअप्स को शुरुआती चरण में निवेश तो मिल जाता था, लेकिन बड़े स्तर पर विस्तार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए पूंजी जुटाना सबसे बड़ी चुनौती थी। स्काईरूट की सफल लॉन्चिंग ने निवेशकों का यह भरोसा मजबूत किया कि भारतीय कंपनियां अब बड़े प्रोजेक्ट भी सफलतापूर्वक पूरा कर सकती हैं।

उन्होंने बताया कि,

2020 में सरकार द्वारा निजी कंपनियों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र खोलना इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण बना। इसके बाद कंपनियों को ISRO की लॉन्च सुविधाओं, परीक्षण केंद्रों और तकनीकी विशेषज्ञता का लाभ IN-SPACe के माध्यम से मिलने लगा। इसी सहयोग ने भारतीय निजी स्पेस सेक्टर को नई गति दी।

भारत की लागत दक्षता भी निवेश आकर्षित करने का एक बड़ा कारण है। भारत का मंगल ऑर्बिटर मिशन लगभग 74 मिलियन डॉलर में पूरा हुआ था, जबकि NASA का समान मिशन MAVEN करीब 671 मिलियन डॉलर का था। यही लागत दक्षता अब निजी स्पेस कंपनियों में भी दिखाई दे रही है।

2033 तक कितनी हो सकती है भारत की स्पेस इकोनॉमी?

अब अंतरिक्ष उद्योग केवल सैटेलाइट लॉन्च तक सीमित नहीं रह गया है। रक्षा, डेटा सेंटर, पृथ्वी अवलोकन, संचार और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में भी स्पेस टेक्नोलॉजी की मांग तेजी से बढ़ रही है। इससे भारतीय स्टार्टअप्स के लिए नए अवसर तैयार हो रहे हैं।

फंडिंग के आंकड़े भी इसी बदलाव की पुष्टि करते हैं। वर्ष 2021 में इस सेक्टर को केवल 43 मिलियन डॉलर का निवेश मिला था। 2025 तक यह आंकड़ा 200 मिलियन डॉलर के पार पहुंच गया। वहीं इस वर्ष अब तक 24 फंडिंग राउंड में 113 मिलियन डॉलर का निवेश आ चुका है।

विकास चौधरी के अनुसार, भारत की स्पेस अर्थव्यवस्था वर्तमान में लगभग 8 अरब डॉलर की है और 2033 तक इसके 44 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। उनका मानना है कि मजबूत इंजीनियरिंग, कम लागत और तेजी से बढ़ते वैश्विक बाजार के कारण भारत का निजी स्पेस सेक्टर आने वाले वर्षों में दुनिया के सबसे तेजी से उभरते उद्योगों में शामिल हो सकता है।

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